Sunday, May 17, 2009

ज़िन्दगी जैसे मेरी परियों की कहानी....

हाँ मैं थक गई हूँ
तितलियों के पीछे भागते हुए,
हाँ मैं ऊब गई हूँ अब.
पुतलों के संग जीवन व्यतीत करते हुए
कब किसको अच्छा लगा है?
संग अपने उनकी भी बातें स्वयं लिखना
व कहना, बड़ी दुर्दशा है.
कोई तो हो जो कहें अपने मन की बातें
तो मैं जीवन भर सुनती रहूँ...
कब तक खुद की कहानियाँ
मैं यूँ ही बुनती रहूँ?
ढूंढती उस राजा को, जो
बदल दे मेरी जिंदगानी;
ढेर सारी खुशियों के बदले
ले ले मेरी सारी वीरानी.
ज़िन्दगी जैसे मेरी परियों की कहानी
और मैं
इन सब कहानियों की अकेली रानी......

4 comments:

अमिताभ श्रीवास्तव said...

chah bhri rachna he, sundar tareeke se shbdo me ukera gayaa he// badhaai.

अनिल कान्त : said...

dil hai chhota sa ...chhoti si asha ... :)

aapki ye manokamna poori ho

aapne bahut pyara likha hai

M Verma said...

इन सब कहानियों की अकेली रानी......
बहुत सुन्दर

Vandana ! ! ! said...

कविता की सराहना के लिए आप सबको धन्यवाद्