Tuesday, March 12, 2013

अनी - बनी

उसका बस यही एक सपना था, सबकी तरह ही, मगर उसके अनुसार सिर्फ और सिर्फ उसी का, कि इक दिन इक राजकुमार आएगा उसकी भी ज़िंदगी में। घोड़े पे सवार होकर..... उसने ऐसा नहीं सोचा था, मगर हाँ..... वो जब आएगा तो सब कुछ बदल जाएगा..... खुशियों में..... कुछ ऐसा ही। उसके सपने को शब्दों में बयान करना शायद खुद उसके लिए भी बहुत मुश्किल था। अब तो बस वो पल ही बता सकता था कि उसका सपना क्या था?  बस उस पल का इंतज़ार करते-करते उसे 32 बरस लग गए..... सिर्फ उसे ही। कहानी लिखने वाला तो उसी पल उस राजकुमार के साथ आया था,  इसलिए उसका यह बता पाना कि अपने सपने का इंतज़ार करना कैसा लगता है? मुश्किल होगा। हाँ.... अगर उस पल के ठीक पहले वाले पल को महसूस भर कर लिया जाए, तो भी उस पगली के इंतज़ार को थोड़ा-बहुत समझा जा सकता है।

कहानी जारी किया जाएगा.............................

Friday, February 1, 2013

नश्तर एहसास.....


क्यूँ नहीं मिलते शब्द
जिनपे उड़ेल डालूँ
अपने ज़िंदा होने का अहसास।

मुझमें नहीं बची है,
रत्ती-भर भी ज़िंदगी,
ये बात कैसे जताऊँ।

मुझे समय के पहिये को
तोड़ कर जलाना है,
अपनी तपिश में।

उस जलन में खुद को
फिर स्वाहा कर देने का
अहसास भी तो पाना है।

ये अब खेल नहीं रहा,
ज़िंदगी की बिसात पर,
अब और कोई चाल बाकी नहीं है।

पत्ते की तरह बिखर कर
किसी हवा के सरकने का
इंतज़ार करना, अब बाकी नहीं है।

किस्मत, जिंदगी, प्यार, दर्द
सब तेरी माया ही होगी,
मगर अब तू भी असरदार नहीं है।

ये ज़िंदगी है तुम्हारी दी हुई गर,
तो तू भी मान ले अब कि
और तोड़ने की अब तेरी औकात नहीं है।

Sunday, December 23, 2012

कठपुतली.....


मुझे बना लो अपनी हाथों की कठपुतली,
और फिर छुपा लेना अपनी आँखों में।

न मैं जानना चाहूँ, क्या है तुझमें,
न मैं कुछ सोचूँ, क्यूँ हूँ मैं तुझमें।

इतना मुझे तुम बस हक दे देना,
किरचें मुझसे होके ही तुम्हें चुभना।

बस रोशनी की ही तुम यूँ परवाह करना,
और उस पल मुझे किसी किनारे रख देना।

मैं तारों से लोरी रोज़ चुन-चुन कर लाऊँगी,
फिर उन्हें बिछाकर तुम्हें तुम्हारी कहानी सुनाऊँगी।

एक साँकल चोर दरवाजे का अपने हाथ रखूँगी,
जीवन में तुम्हारे बस इतना ही सेंध लगाऊँगी।

खुशियों का अधिकार दे देना तुम सबके नाम,
आँसू की कीमत हो सिर्फ मेरे नाम पे नीलाम।

तुम हँसना मेरी बेतुकी हरकतों पर कभी-कभी,
मैं जोकर की जोकर बन कर फिर जी लूँ तभी।

तोड़ना-मरोड़ना जब जी चाहे तुम मुझसे लड़ लेना,
बिना लकीर वाली कोई किस्मत मुझको बना लेना।

इस तरह तुमसे ताउम्र जुड़े रहने की इच्छा रखना,
कि एक अविश्वास की नोंक पे सदियों दूर चले जाना।

बस इतने पल बना लो अपनी हाथों की कठपुतली,
बस इतने पल फिर छुपा लेना अपनी आँखों में।

बस इतने पल बना लो अपनी हाथों की कठपुतली,
बस इतने पल फिर छुपा लेना अपनी आँखों में।

Wednesday, October 10, 2012

यूँ ही कुछ अनकही.....


यूँ तो मैं घर पर फोन कभी-कभार ही किया करती हूँ, शायद सप्ताह में एक बार या फिर १५ दिन में एक बार। लोग अजीब ही समझते होगे मुझे कि मैं घर पर फोन कम करती हूँ। शायद मुझे फोन से चिढ़ है या फोन पर माँ-पापा से बात करना मुझे बिलकुल नहीं आता। हाँ जब भी छुट्टियों में घर जाती हूँ तो घंटों-घंटों बातें करती रहती हूँ। अक्सर पापा के सिरहाने में रखे दो तकियों में से एक को चुराकर, या नहीं तो उनकी पीठ को ही तकिया बनाकर और मम्मी के गोद में पैर रख कर धीरे-से इशारा करना कि थोड़ा और माँ, वहाँ जा के किसको बोलूँगी?’ कुछ ऐसे एक्सप्रेशन बनाकर, कभी बालों को सहला देने की मिन्नतें कर के कि बस तब तक ही करना, जब तक कि मैं सो न जाऊँ। तो इस तरह के हर प्रकार की मनमानी करते हुये मैं घंटों बातें कर सकती हूँ। शायद मुझे ऐसे ही बातें करना आता है। मुझे सुबह में उनींदी में भी बातें करना अच्छा लगता है, जब पापा टूथपेस्ट ढूँढ़ने आते हैं या अलमारी की चाबी या माँ से देरी क्यूँ हो रहा हैं नाश्ते में? - ये पूछवाने के लिए भी, जब मेरे बिस्तर से एक-एक करके तकिया, चादर, कम्बल सब गायब होने लगता है तब। कभी-कभी तो ठीक मेरे सिर के पास वाली खिड़की खोल के चले जाना, जिससे ठंडी हवा लगकर मुझे रोज सुबह छींक आने लगती है, पापा के पास हर चाल होती है मुझे जगाने के लिए और मेरे पास थोड़ी देर और पापा के हर बहाने।
पापा को उनका स्कूटर निकलवाने के लिए दरवाजा खोल के खड़े रहना, तो कभी उनकी नॉन-स्टॉप पें-पें से तंग आकर कहना कि सुनाई दे दिया हैं , फिर भी उनके पें-पें का चलते रहना, जब तक कि मैं दरवाजा खोल के किवाड़ को पकड़े न रहूँ, स्कूटर को अंदर आने देने के लिए। हर बार मम्मी और मेरा प्रवचन कि आप इतना हॉर्न मत बजाओ, हमको सुनाई दे जाता है एक बार में। लेकिन सूरज तो पूरब से ही उगता है, वैसे ही मेरे पापा।
एक बार की बात है, मैं क्लास ७ में थी उस समय। उस दिन मैं टिफ़िन नहीं ले के आई थी, सो मम्मी ने पापा को ऑफिस जाते वक़्त देते जाने को कहा था। पापा स्कूल पहुँच कर सब भूल गए कि मैं किस क्लास में हूँ, सेक्शन की तो बात ही भूल जाइए। एक टीचर से पूछने लगे कि मेरी बेटी को टिफ़िन पहुँचाना है। उस टीचर ने क्लास और सेक्शन पूछा तो पापा ६-७ में कन्फ्युज हो गए, सेक्शन तो बता ही नहीं पाए। खैर टीचर ने फिर नाम पूछा तो पापा ने कहा बुटरु (यह मुझे घर में बुलाया जानेवाला नाम है), टीचर तो पहले समझी ही नहीं कि नाम क्या है, फिर अजीब-से मुद्रा में देखते हुये दुबारा पुछी कि स्कूल का नाम क्या है? अब पापा को ध्यान आया तो वो गलती सुधारते हुये बोले जी कविता.... नहीं कल्पना..... नहीं........... इसके बाद उनके चेहरे में एक बड़ा-सा ब्लैंक आ गया था। दरअसल वो सबसे पहले मेरी बड़ी दीदी का नाम लिए कविता फिर मेरी छोटी दीदी कल्पना का और मेरे नाम पर आते-आते वो ब्लैंक हो गए। तभी मेरी सहेली अलका वहाँ से गुजर रही थी, और शायद वो उनको टीचर से बातें करते हुये देख ली थी। उसने पापा को कहा कि अंकल! चलिये मैं आपको बन्दना के क्लास में ले जाती हूँ। फिर तब तक किसी ने मुझे भी बता दिया था कि तुम्हारे पापा तुमको ढूँढ़ रहे हैं, तो मैं उनको सीढ़ियों में ही मिल गयी। बाद में वो टीचर (रूपा दीदी) जो मुझे अच्छी तरह से जानती थी, क्लास मे हँसते हुये कहने लगी कि तुम्हारे पापा को तुम्हारा नाम ही याद नहीं था। उस दिन घर जाके हम सबसे पहले अपना क्लास और सेक्शन रटवाये और नाम को लेकर खूब बहस किए कि बुटरु कह के किसी से पूछिएगा नहीं अबसे।
कल-परसों इंग्लिश-हिंगलिश देख के आई तो मुझे अपने दिन याद आने लगे, जब मैं मम्मी के बजाय पापा को रिज़ल्ट वाले दिन स्कूल आने के लिए कहती थी, इसलिए नहीं कि मम्मी की इंग्लिश अच्छी नहीं थी (क्यूंकि मैं पाँचवीं तक मम्मी के चूल्हे के पास ही पढ़ाई पूरी की हूँ),  बल्कि इसलिए कि मुझे पापा बहुत स्मार्ट और हैंडसम लगते थे। पापा कई बार ऑफिस से आने में दिक्कत होने के कारण मम्मी को जाने कहते थे तो मैं कहती थी कि नहीं पापा, आप कैसे भी करके आओ। पापा के क्यूँ पूछने पर मैं धीरे-से पापा को कान में कहती थी कि मम्मी स्मार्ट नहीं लगती न!
वैसे चाहे मम्मी आई हो या पापा आए हो, मुझे मेरी टीचर रूपा दीदी से बहुत डर लगता था कि पता नहीं कहीं मेरी शिकायत न कर दे। खैर शिकायत तो कभी हुई नहीं, पीठ पीछे बहुत तारीफ मिल जाती थी J
मेरी बड़ी दीदी का घर का नाम सोनू है, छोटी दीदी का पिंकू, छोटी बहन का निक्की, दोनों चचेरे भाईयों का नाम गजेन – बीरन, चचेरी बहन का नाम अनीता, बस सिर्फ एक मेरा ही नाम नहीं सोचा गया किसी से। कुछ नाम नहीं होने के कारण लोग बुतरु-बुतरु बुलाते थे, जो बाद में बुटरु में तब्दील हो गया। इस बात का गुस्सा मुझे बहुत रहता था बचपन में कि ये भी कोई नाम है? मेरी सहेलियाँ कभी घर आती और किसी के मुँह से बन्दना की जगह बुटरु निकल जाता तो मेरा पारा हाइ हो जाया करता था। कई बार तो सहेलियों के घर आने से पहले सबको मैं ताकीद कर देती थी कि कोई भी मुझे बुटरु कह के नहीं बुलाएगा। एक-दो बार सभी ने इस बात का ख्याल भी रखा था, लेकिन फिर मुझे ही अजीब लगने लगा कि बन्दना सुनने से अच्छा बुटरु ही ठीक है। फिर कुछ दिनों के बाद मैंने एक दिन रसोई में जाकर खुद ही कह दिया, मम्मी! मुझे जैसे बुलाती हो, वैसे ही बुलाना अभी मेरी सहेलियों के सामने। मुझे वही नॉर्मल लगता है।
स्कूल से आते ही मैं रसोई के दरवाजे में खड़ी हो जाया करती थी, और मम्मी को स्कूल मे जो कुछ भी होता था, पूरे का पूरा सुनाया करती थी। मेरी बातों को सब सुनते थे, बस मेरा छोटा भाई उसे पसंद नहीं था स्कूल की बात घर पर बताना। पापा के लिए एक चीज़ मैं स्पेशल रखा करती थी जो सिर्फ पापा के आने पर ही सबके साथ सुनाया करती थी, और वो स्पेशल चीज़ थी स्कूल में सुना हुआ कोई नया जोक। जोक को भूल न जाऊँ घर तक पहुँचते-पहुँचते, सो मैं रास्ते-भर उसे दोहराया करती थी।
स्कूल से लौटने से याद आया कि मेरे फ्लैट में एक बंगाली परिवार भी था, जिसकी इकलौती बेटी मेरे से एक साल जूनियर थी और वो हमेशा मेरे साथ स्कूल जाती थी, मगर आते वक़्त अक्सर मैं उसको भूल जाती थी और आगे निकल आती थी अनीता के साथ। फिर बीच रास्ते मे याद आता था कि जा! रूपा को तो पीछे भुल आए। फिर मैं वहीं बीच रास्ते में उसका इंतज़ार करती कि वो मिल जाएँ और हम साथ-साथ अपनी बिल्डिंग में प्रवेश करे। नहीं तो उसकी माँ मुझसे पूछेगी कि रूपा कहाँ है? उनको जवाब देने से बचने के लिए मैं वहीं रास्ते में इंतज़ार करने में अपनी भलाई समझती थी।
पापा ऑफिस से आने के बाद अक्सर शाम को बाहर निकल जाते थे, अगर कोई बाज़ार का काम नहीं हो तो। कभी किसी अंकल के यहाँ तो कभी किसी रिश्तेदार, जान-पहचान के यहाँ तो कभी किसी काम से ही, मगर अक्सर अकेले ही जाते थे। और मम्मी के बजाय हम ही शिकायत करते थे कि आप अकेले-अकेले क्यूँ चले जाते है, मम्मी को क्या घूमने का मन नहीं करता है क्या? तो पापा का कहना होता था कि तुम्हारी मम्मी तैयार होने मे बहुत टाइम लगाती है, उतनी देर में तो हम घूम के आ जाएगे। कुछ दिनों तक ऐसा ही चला। पापा को जब कभी भूले-भटके मन करता, तब ही मम्मी को बाहर घुमाने ले जाते। इक दिन मैंने पापा को ऑफिस से आने के बाद देखा कि वो फिर से तैयार हो रहे है। मैंने स्कूटर की चाबी छुपा दी और फिर पापा से पूछा – आप कहीं बाहर जा रहे हैं पापा?’। उन्होने ने हाँ में सिर हिलाया। कहाँ जा रहे हैं?- मेरे यह पूछने पर उन्होने कहा – एक जगह [पापा कभी जगह का नाम नहीं बताते थे, पूछने पर बस यही कहते थे –एक जगह]
पापा आप ५ मिनट रुकोगे, मुझे एक काम है
ठीक है, जल्दी करो –ऐसा कह कर वो फिर से तैयार होने लगे। उनकी एक आदत थी वो इंतज़ार नहीं करते थे, अगर मैं ५ मिनट से ज्यादा टाइम लेती तो उनकी स्कूटर तो पक्का से फुर्र हो जाती।
मैं रसोई में दौड़कर मम्मी को बोलने गई कि मम्मी! जल्दी करो... पापा तुमको ५ मिनट में तैयार होने बोले हैं। शीला अंकल के यहाँ जा रहे हैं। फिर मम्मी के समझने से पहले ही उनके लिए साड़ी और मैचिंग की सारी चीज़ें निकाल कर उनको तैयार कराने लगी। ५ मिनट से ज्यादा होने पर पापा ने आवाज़ दिया कि जल्दी करो। मैं दौड़ कर पापा के पास गई और कही कि रुकिए मम्मी तैयार हो रही है। ऐसे भी स्कूटर का चाबी उनको चमका के दिखा दिये थे।
मम्मी कहाँ जाएगी?’
घूमने! और कहाँ?’
कहाँ घूमने जाएगी मेरे साथ?
एक जगह – ऐसा कह कर मैं वापस मम्मी के पास गई और उनको तैयार करा के लायी और फिर स्कूटर का चाबी दिये। फिर हँसते हुये कहे कि पापा! अगली बार से मम्मी को तैयार होने लेट नहीं होगा। उधर मम्मी परेशान कि खाना तो बनाए ही नहीं है। मम्मी को भी कहे कि टेंशन मत लो, खाना हम बना लेंगे, तुम आज पापा का वो एक जगह घूम के आ ही जाओ। उस दिन के बाद से हम बहन सब ये वाला खेल अक्सर खेलते थे, पापा के साथ। कभी-कभी तो पापा–मम्मी दोनों को अलग–अलग जाकर बोल देते थे कि बोल रहे हैं/रही हैं बाहर जाने के लिए तैयार होने को और तैयार करा के भेज देते थे। पापा तो हंस देते थे बस, मम्मी ही बोलती थी कि तुमलोग क्यूँ ऐसी बदमाशी करती हो?। हम भी बेशरम से बोलते थे कि अभी नहीं घूमोगी तो बुड्ढी होने के बाद घूमने का शौक पूरा करोगी! एक तो कभी डिमांड करने ही नहीं आता कि घूमने चलिये। बाद में कहीं हमलोगों को दोष दोगी कि तुमलोगों के कारण कभी अपना शौक पूरा नहीं किए.... वगैरह वगैरह J
ऐसी कितनी ही बातें अभी भी अनकही ही हैं, आज सब इसलिए याद आने लगे क्यूंकि आज सुबह-सुबह ही पापा ने फोन किया था। आज मुझे मैकेनिकल इंजीनियरिंग के बच्चों को इंडस्ट्रियल टूर पर ले जाना था और उसके लिए मुझे ५.३० सुबह तक तैयार होना था। इसके लिए मुझे ४ -४.३० सुबह तक तो उठना था, अब आदत तो ८ बजे की थी। सो मैंने अपने एक पड़ोसी को कह के रखा कि आप दरवाजा खटखटा देना, अगर उठ जाए तो। फिर भी मुझे डाउट था अपने उठने पर, सो मैंने मम्मी को फोन करके उठाने की ज़िम्मेदारी दे दी। मुझे ये भी पता था कि जगाने के लिए मम्मी नहीं पापा ही फोन करेगे। पता नहीं ऐसा क्यूँ होता है? जब भी कभी किसी काम के लिए, ट्रेन पकड़ना हो या कुछ और काम, मुझे रात-भर नींद नहीं आती। घंटे-घंटे की देरी मे उठ कर टाइम चेक करती रहती हूँ। आज भी ऐसे ही करके मैं सो नहीं पायी ढंग से, उसपे ठीक ४.१५ को घर से फोन आया। उस समय मुझे नींद अच्छी आ रही थी, लालची मन ने १० मिनट और सोने के लिए फोन पे झूठ बोल दिया कि हाँ पापा! जाग गए है। १० मिनट बाद फिर फोन आया तो हम झट से उठ के फोन रिसीव करके बोले कि हाँ पापा! इस बार पक्का से उठ गए हैं। उधर से पापा हंसने लगे और बोले कि हमको पता था कि तुम फिर से सो जाओगी। फिर जब हम ब्रश कर रहे थे तो पापा ने फिर से एक बार फोन किया ये चेक करने के लिए कि हम सही में उठे है कि नहीं। इस बार भी हम पापा को बोले कि हाँ पापा! हम सच का उठ गए हैं। और ब्रश की आवाज़ सुनकर भी उनको यकीन आ गया, तब जाके वो दोबारा सोने गए। आज सुबह से बारिश हो रही थी, पटना और उसके आस-पास जगहों में, तो उसी किसी बारिश के ठंडे झोंकों में से किसी एक में पापा का इस तरह से मुझे जगाना अचानक से बहुत याद आने लगा।

Saturday, September 15, 2012

वक़्त और मैं .....


है कोशिश यही कि उसे भी मुझसे हो इश्क़ इतना,
ज़रा सा बहकूँ मैं, कि बाँहों में उसके ही है सँभलना।

साँसों की डोर से बँधकर ये तेरा हर पल गुजरना,
तन्हाई के मौसम में तेरे ही लिखे पल को पढ़ना।

ओढ़ा के कोई अमावस की रात, यूँ मुझे कभी भुल जाना,
या टाँकना फिर तारों को, इस तरह फिर याद भी करना।

मेरे काजल के डिब्बी में अपनी नज़र बंद कर आना।
या इन बारिश की बूँदों को मेरे बालों में गूँथ जाना।

देकर ढेर सारे खाली-खाली से पल मुझसे बतियाना,
तो चुपके-से बीते कल के कुछ गुब्बारे भी पकड़ा जाना।

ऐ वक़्त! तेरा पल-पल मेरे आस-पास यूँ मौज़ूद रहना,
है गवाह उस बात का, हक जिससे है तेरा मुक़र जाना।

मगर है कोशिश यही कि तुम्हें भी मुझसे हो इश्क़ इतना,
ज़रा सा बहकूँ मैं, कि बाँहों में अब तुम्हारे ही है सँभलना।

Saturday, September 8, 2012

अंतर-संवाद


“ओह नो! सवा चार तो कबके हो गए! नहीं उससे भी ज्यादा, ४ मिनट तो ऐसे ही आगे रखा है मैं टाइम को। हम्म .....लैपटाप बंद कर दिया ये मैंने.....और वो पाउच कहाँ गया ? दीख नहीं रहा..... मिल गया !!!! फोन !!!!!! फोन रखा है न मैंने? हाँ है.....पहले ये टेबल सब साफ कर ले। ये कप तो साफ किए नहीं.... अभी पानी डाल देते है.... कल सुबह धो लेंगे। आज कौन सी किताब ले जाएँ? ये वाली ले लेती हूँ, टाइम मिला तो नोट्स बना लेंगे। नहीं.... इससे तो अभी ही बैठ के नोट्स बना लिए है। तब राममरुथम ले लेते है, इसमें से क्वेश्चन चुन लेंगे एटलिस्ट, जो कि कल डिस्कस किया जा सके। इतनी मोटी बुक है, इसे हाथ में ही ले लेती हूँ। अलमारी की चाबीइइइइ....... अरे अलमारी में ही तो लगी हुई है! लॉक हो गया! अब दराज सब को भी लॉक कर देते है। अरे टिफ़िन तो रह ही गया......अच्छा हुआ याद आ गया, नहीं तो फिर इक दिन तक सड़ते रहता। और कुछछछ..... नहीं अब सब पैक हो गया है।”

“बाक़ी लोग? लगता है बस के लिए निकल गए है। चल वंदना, नहीं तो बैठने को जगह नहीं मिलेगी।....... फ़िज़िक्स वाली मैडम अभी भी है लैब में..... माने टाइम है अभी बस का। फिर भी जल्दी चलना चाहिए।”

“किसका बैग है ये? थैंक गॉड! जगह मिल गयी। वो मैडम के लिए जगह मिलेगी क्या? कोई नहीं! यहीं शेयर कर लेंगे, हमेशा की तरह! J

“५ बजनेवाले है, अभी तो कमड़े में ही है बस। सब्जी लेना है क्या आज? टमाटर तो है अभी, कल दो यूज़ किया था, दो तो होंगे ही। मिर्च..... नहीं है.....प्याज है.... आज सब्ज़ी किसी और से लेंगे। वो खूसट हमेशा देख के अपने से सब्ज़ी लेने को कहता है। वो अम्मा के यहाँ सब्ज़ी ढंग की मिल जाती है, और दाम भी ठीक ही लेती है। चल अपना क्या! एक पाव भी लो तो ज्यादा बन जाता है। कल वो पगला दिखा नहीं, सब्ज़ी-रोटी तो रखा ही रह गया। कोई नहीं.... फेंक देंगे। अरे! दूध तो गरम ही नहीं किए आज, पक्का फट गया होगा।”

“आ गया पंडरा..... अरे मुझे तो याद ही नहीं रहा..... अब तक तो वो चले गए होगे, फोन करके पूछते है, पहुँचे कि नहीं? रात को करते है। चलो आज दीदी के घर नहीं घुसते है, फोन कर देंगे कि दूध लेने आराम से आयेंगे। अरे नहीं चाबी तो दीदी के पास ही होगी आज। अच्छा हुआ याद आ गया, नहीं तो फिर आना पड़ता!”

“उनको रास्ता याद होगा न, मुझे बता देना चाहिए था। नहीं रे, ईज़ी सा रास्ता तो है, उनको याद ही रहेगा। दीदी का घर तो सामने ही है। नाश्ता कहाँ किया होगा उन्होने? मुझे जल्दी उठ जाना चाहिए था आज, कुछ बना लेती! पता नहीं कॉर्नफ़्लेक्स, ब्रैड खायें भी होंगे कि नहीं? अच्छा हाँ! आज तो दूध उनको गरम कर के दे दिया था!”

“कुछ चीज़ ढूँढने में दिक्कत तो नहीं हुआ होगा न, फोन भी नहीं किया मैंने इक बार भी। कॉलेज जाने से मुझे और कुछ याद ही नहीं रहता है। अरे हाँ, मैं लैपटाप आज यहीं रख देती तो उनको बोर नहीं लगता, और वो अपना कल जो देख रहे थे वो भी काम पूरा कर लेते।”

“उफ़्फ़..... दो दिन कितना अच्छा लगा था, पहली बार आए थे, इतने दिनों के बाद मेरे घर में। कोई आके चला जाता है तो ज्यादा गुस्सा आता है। क्यूँ आए? कल का परवल का सब्ज़ी भी अच्छा नहीं बना था। मेरे से ज्यादा अच्छा बनाने के चक्कर में खराब ही बनता है। लेकिन पकौड़े तो खूब खाये!.... पेट खराब न हो गया हो..... आज जर्नी भी था। ऐसे भी आज कल उनका पेट ठीक नहीं रहता है। लेकिन, फिर भी खाने का मन नहीं जाता उनका! बोलना होगा। बोलेंगे भी तो हंस देंगे, हमेशा की तरह।”

“ये क्या है? अरे ये तो उनका टिक़ट है, मूरी टु रांची!!!!! मिस यू सो मच!!!!! कितना अच्छा था न कल तक दिन! सैटरडे से उनके आने की राह देखे, कब आयेंगे? कब आयेंगे? फिर किसके यहाँ रहेंगे? मेरे यहाँ रहे, कभी भी नहीं आयें है यहाँ पर, और इसके बाद तो शायद मैं पटना चली जाऊँ? फिर इस घर में कब आना होगा? दीदी भी सोची होगी न, मेरे यहाँ नहीं रुके, कोई नहीं उनके यहाँ तो हमेशा आते जाते रहेंगे! मेरे यहाँ शायद इसी बार हो पाता।”

“उफ़्फ़.... ये क्रीम बॉटल सब छुपा देना चाहिए था, कल कितना पूछ रहे थे, ये क्या है, इतना क्यूँ? डांटे ही नहीं बस। हे हे नहीं भी बताते तो, उनसे कौन छुपा सकता है, और मेरी तो वो हर रग को पहचानते है! मैं भी न!”

“हम्म..... चाय बनाए थे इसका मतलब! उफ़्फ़ ये प्लेट क्यूँ धो के रख दिये? हम नहीं आके धो सकते थे क्या? अरे वाह दूध पूरा खतम! हम्म ये कॉर्नफ़्लेक्स का डिब्बा तो बहुत हल्का लग रहा है, माने कि खूब अच्छे से नाश्ता करके गए थे! J..... उनको भी मैंगो फ़्लेवर का कॉर्नफ़्लेक्स पसंद आया!!!!!!...... हम दोनों की पसंद तो इक होनी ही है...... हे हे हे....”

“कितना अजीब लग रहा है...... दो दिन पहले की बात थी, अब जाने के बाद इतना खराब क्यूँ लग रहा है..... मुझे आज हाफ़ डे करके आ जाना चाहिए था। कम से कम उनके जाने के समय तो रहते। सुबह उनको सब चीज़ बता कर गयी थी। ये ऐसे करना, और इसको ऐसे। किचन का ज़मीन गंदा क्यूँ है इतना? अच्छा..... लगता है इंडक्शन काम नहीं किया होगा, ओहहो..... फिर तो गैस में बनाए होंगे? तभी सोचूँ..... ये गंदा हुआ कैसे? अरे! माचिस उनको आराम से मिला होगा न। नहीं भी तो पूजा वाला माचिस तो दिखा ही होगा। कल उनका चप्पल हम रगड़-रगड़ के साफ कर दिये थे, उनको फर्क महसूस हुआ होगा कि नहीं? पहले जूता पॉलिश करना हो तो मुझे ही बुलाते थे..... और तब मैं गुस्सा से करती थी कि मुझे ही क्यूँ हमेशा बोलते है? और कभी-कभी मुझे उनका जूता पॉलिश करना कितना अच्छा लगता था!”

“कल कितने देर तक उनसे बात किए! और उनको भी नींद नहीं आ रहा था..... सच में कल बहुत अच्छा लगा, हमने कितनी सारी बातें की! उफ़्फ़.... और आजकल तो मैं और भी बात कर लेती हूँ, और वो भी अब कितनी बातें बताने लगे है। वो टिक़ट अच्छे से रख लेती हूँ। यहाँ भगवानजी के पास!........क्यूँ चले गए?

“निक्की को फोन करके बताते है। उसको पता तो होगा ही, साथ में बात करना चाहिए था। इसका भी फोन ऐन टाइम पे नहीं लगेगा...... ये चद्दर सब भी मोड़ के गए हैं, अरे बाबा मुझे भी तो कुछ करने दीजिये...... उस दिन नींद नहीं आ रही थी फायनली वो ज़मीन पे ही सो पाये। इससे अच्छा तो दीदी के यहाँ पर ही रहते। कल ठंड लग रही थी उन्हें, लेकिन कंबल भी नहीं ले रहे थे। कितना कहने के बाद वो पतली रज़ाई लिये। घर में रहते तो मेरा कंबल कौन-सा है इसी में हम झगड़ा कर रहे होते!”

“ये मेरा वाला स्लीपर उनको आ ही गया होगा। ऐसे भी दो साइज़ बड़ा लिया था, पहनते-पहनते तो और भी बड़ा-सा लगता था। ऐसे भी खाली पैर चलने से उनको दर्द हो जाया करता था। अच्छा.....उनका एड़ी का दर्द गया कि नहीं? पूछा भी नहीं.... नहीं नहीं.... पिछली बार घर गए थे ठीक था, बोले थे.....”

“क्या बनाऊँ? अब अकेले कुछ बनाने का मन भी नहीं कर रहा है। कल लेकिन चिली चिकन अच्छा ही बना था! मुझे तो ड़र लग रहा था..... कितने साल हो गए थे बनाए हुये..... पता नहीं उनको मेरे हाथ का चिली चिकन इतना खाने का मन क्यूँ करता है...... जैसे तैसे तो बना देती हूँ। लेकिन चलो..... उनको चिली चिकन खाने का मन था और कल मैंने किसी भी तरह से बना के खिलाया भी। वो तो दीदी के घर में बनाने के चलते ड़र लग रहा था..... खैर इस बार घर जाऊँगी तो फिर से अच्छे से बना के खिलाऊँगी। बस घर ही कब जाऊँगी, यही पता नहीं। अरे उनके दवाई का पत्ती तो यहीं रह गया! अरे नहीं.... ये तो सब खतम हो गया है। अच्छा ये गिलास इसीलिए यहाँ पर पड़ा है...... यहीं पर दवाई खा के रख दिये होंगे। ये दवाई अभी भी ले रहे है......ठीक ही करते है। इस पत्ती को फेंकने का मन नहीं हो रहा है। मैं भी न!”

“दीदी ने फोन पर बताया कि वहाँ नाश्ता किए ही नहीं , माने कि सब खा के ही गए थे। अच्छा हुआ सुबह सब कुछ मैंने बता कर गयी थी, लेकिन रास्ता क्यूँ नहीं बताया? सोच भी रही थी कि बता देते है। बस इक वही चीज़ नहीं बताया और बाएँ के जगह दायें घूम गए..... और फिर रास्ता भूल गए। उफ़्फ़ धूप भी होगा,......छाता ????? हाँ ले गए हैं...... चलो ठीक किया.... नहीं तो बारिश होती तो परेशानी होती। वो छाता मम्मी को अच्छा लगेगा।”

“वो पगलू सुबह दरवाजा खटखटाया होगा..... पता नहीं उसकी बोली समझें भी होंगे कि नहीं? कोई नहीं। वो भी कौन सा बात किया होगा पापा को देख के? चल वंदना..... गेट बंद कर लेते है। अब पढ़ने का भी मन नहीं कर रहा है। उफ़्फ़... कितने अच्छे दिन थे वो..... जमशेदपुर के.... पापा आपने हमलोगों को कितने अच्छे दिन दिये है कि अब भी भुलाए नहीं भूलते...... पता नहीं मैं भी कब आपको वैसे ही अच्छे वाले दिन दे पाऊँ? काश! वो दिन जल्द ही मेरे हाथों में आ जाए और फिर मैं आप दोनों को पूरी दुनिया की सैर कराऊँगी!

Monday, July 9, 2012

वह मुझसे पूछता है.....


वह मुझसे पूछता है,
इक दिन, बड़े दिनों के बाद;
क्या तुम परेशान हो,
इन दिनों?

मैं घूरती हूँ,
अपनी आँखों की
परछाईयों को,
नीले दीवार पर।

एक सदी जैसा
पल गुजरने के बाद,
मैं कहती हूँ,
हाँ, शायद या पता नहीं।

फिर उस सदी जैसे
पल को पीछे भेज कर,
मैं उससे पूछती हूँ,
ऐसा क्यूँ पूछे तुम?

तुम्हारे लिखे शब्द
देखे थे मैंने,
कुछ दिनों पहले -
ऐसा कुछ वह मुझसे कहता है।

मैं हँस कर
सोचती हूँ,
क्यूँ लिख कर
ज़ाहिर होती हूँ?

और मैं फिर से किसी
गर्त में डुबकी लगाकर,
साँसों का घुटना
जारी कर देती हूँ।


Friday, June 29, 2012

अपने मन की बात.....


नीली दीवार पर
आईने का चौकोरपन,
नहीं बाँध पाता
मेरे अंदर का खालीपन।

इस्त्री किए हुए
सभी कपड़ों के बीच,
मैं छुपा नहीं पाती
अपने मन का सच।

ये घड़ी की सुईयां
इतनी भी नहीं नश्तर,
कि फेंक सकूँ मैं
जो भी बचा मेरे अंदर।

एक टंगा लाल झोला या
गुच्छे चाबियों का सारा,
नहीं है तो बस वो कील जिसे
समझ सकूँ मन का सहारा।

कैलेंडर में दीखता तो है
मौसम का बदलना,
फिर क्यूँ रुका हुआ है,
यादों का यहाँ से जाना।

बिस्तर में तकिया
ही सोता है पूरी रात,
मैं चादर की सिलवटों में
लिखती अपने मन की बात।