Thursday, December 3, 2009

तब मन को मसोसा है मैंने.....

जाने क्या मैं ढूँढ़ती,
मैं सबकी आँखों में.
क्या सोचते होगे लोग
मेरे बारे में.

शायद कुछ और ही
समझने को मिले.
इस जीवनरूपी पहेली का हल
किसी और से ही सही,
मगर कुछ तो मिले.

हर दफ़ा मैंने उनको
सुना; वो भी सुना,
जो नहीं थी किसी ने कही.
हर दफ़ा भीड़ में मैं जब भी चली;
औरों की तरह अकेले ही बढ़ी.

लोगों की बातें सुनते हुए
कई बार गौर किया है मैंने;
मैंने ऐसा क्यूँ नहीं सोचा?--
सोच के तब मन को मसोसा है मैंने.

5 comments:

अनिल कान्त : said...

aap kavita ke maadhyam se man mein chal rahi utha patak ko achchhi tarah shabdon mein dhaal leti hain.

achchha lagta hai padhkar.

Vandana ! ! ! said...

jee han anil ji.. kuch dino se mujhe bhi aisa lag raha hai ki main kagazon se jyada achchi tarah se baatein kar leti hun...waise pasand karne ke shukriya...... :-)

अर्कजेश said...

सच है ! जाने अनजाने सारी कवायद खुद की ही तलाश है । कई बार हम दूसरों के माध्‍यम से खुद को जानते हैं ।

कहती रहें ऐसी ही सरलता से ।

Anand Rathore said...

hum to kore kagaz the log kya kya padh gaye..
jiske dil mein jaisa aaya , vaisi kahani gadh gaye..

Vandana ! ! ! said...

राठौर जी आपने तो बहुत ही सही बात बता दी. सही में नजरिया हमारी सोच से बदलता है. हम जैसा चाह्हे देखना शायद वही हमें दीखता है.