Thursday, February 7, 2008

मेरी एक सहेली है....



मेरी एक सहेली है,
बहुत अच्छी !!
बहुत वर्षों के बाद,
अब जाकर
मुझको यहाँ मिली है.

मेरी एक सहेली है,
बिलकुल मेरे जैसी !!
चंचल तो कभी शांत-सी,
सिर-से-पाँव तक जैसे
मेरे रंग में ही ढली है.

मेरी एक सहेली है,
भावुक-सी !!
छुई-मुई की तरह कोमल-सी,
तो ओस की बूंद की तरह निर्मल-सी,
कभी नीम तो कभी मिसरी की डली है..

मेरी एक सहेली है,
मेरी हमराज़-सी !!
मेरे भावनाओं में बहनेवाली,
मेरे अंतर्मन में प्रकाश करनेवाली,
मुझसे मुझको ही चुराती,
व मुझे ही सौंप जाती,
एक सुखद स्वपन की भांति, अबूझ पहेली है..

मेरी एक सहेली है,
मेरी परछाई-सी !!
हज़ारों की भीड़ में मुझे ढूँढ़ निकालनेवाली,
जग से लड़ मेरी परवाह करनेवाली,
मुझे अपना समय देकर भी
वो मुझ-जैसी ही अकेली है..

मेरी एक सहेली है.....

1 comment:

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

अभाव और अमूर्तन की प्रच्छन्न लुकाछिपी है कविता में ! कसक भी !