Monday, May 24, 2010

जीवन-माला

मोती की भाँति वो सारे पल,
बिताए थे जो तेरे संग कल;
समय के हाथों पिरोते चले गए,
मेरी यादों के धागों में जुड़ते गए.

कुछ पल फिर भी अधूरे-से रह ही गए तो
कुछ की चमक समय के साथ धुलती गई;
और कहीं-कहीं से तो मेरी यादों के धागों में
जाने कैसी और कितनी-ही गाँठें पड़ती गई.

इसलिए,जीवन मेरा इन मोतियों की
सुन्दर माला तो बन न सकी;
पर कोई दुःख भी नहीं,जो मैं
इसे कभी पहन न सकी.

मैंने अब भी इसे वैसे ही
संभाले रखा है;
अपने मन की झरोखे पर
बीचोंबीच टाँगे रखा है.

कि तुम्हें छूकर कोई हवा
कभी तो इस तरफ आएगी;
तुम्हारे छुअन से मेरी ये जीवन-माला
शायद फिर-से निखर जाएगी.

7 comments:

alka sarwat said...

बहुत भावुक कविता लिखी है आपने
पुरउम्मीद फिर भी हैं आप ,ये अच्छी बात है
जिन्दगी का रहस्य तो बड़े बड़े न सुलझा सके ,हम आप तो कोशिश कर ही रहे हैं
कोशिशें हमारे बाद भी होती रहेंगी
पर ...जिन्दगी ...कैसी है पहेली हाय ......

Neetu said...

bhut accha h y jeevan mala jo maan ko itna chu gya

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है .

संजय भास्कर said...

अच्छी लगी आपकी कवितायें - सुंदर, सटीक और सधी हुई।

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

बेहद ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति

prasantk said...

poignant... beautiful

Vandana ! ! ! said...

thanx to all!!!!!