Tuesday, October 19, 2010

लव आज कल - भाग २

कभी-कभी सोचती हूँ कि ऐसा क्या देख लिया उसमें जो अब तक उसे भूल नहीं पाई. उससे मिलना, जिंदगी का दो, तीन, चार और न जाने कितने राहों में बंट जाना और उस बंटी हुई जिंदगी का अलग-अलग राहों पर चलने को विवश होना, न ढंग से हँस पाना और न ही मन से रो पाना, वक्त की इक ऐसी ड्योढ़ी में आ के इस असमंजस में पड़ जाना कि दरवाजा किस ओर से खुलता व बंद होता है? कभी-कभी सोचती हूँ दरवाजा खोल के बाहर निकल जाना बेहतर है या दरवाजे का बंद रहना. खुली हवा में दम घुटने न लगे तो अक्सर कमरे के भीतर जोर-जोर से सांसें लेने लगती हूँ कि बाहर की आदत अब छूटने-सी लगी है.

आज फिर एक साँस ऐसी अंदर चली गई जिसमें उसका फिर से मिलना लिखा था. यह साँस भी अब सालभर पुरानी हो चली है, मगर उस मुलाकात की खुशबू अब भी वैसी ही है. उसका झूठ-मूठ का गुस्सा कि मुझे क्यूँ नहीं बुलाया, उस वक्त का सबसे नादान और प्यार-भरा मनुहार था. और उसके लिए मेरा सहेली से झूठ बोलना इस बात का गवाह कि मुझे भी उसी से मिलना था.

       “दोस्त! वीकेंड पर क्या कर रही हो?”—श्यामली ने फोन पर मुझसे पूछा. उसका मिलने का प्लान था और मुझे भी लगा कि अब कुछ वीकेंड कोलकाता में भी बिताना चाहिये.

       “कुछ भी नहीं, तुम बताओ कुछ प्लान बनाया है क्या?”,

“कल ११.०० का शो देखें? साथ में मेरा एक फ्रेंड भी है. अगर तुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है तो! और उसके बाद वहीँ पर लंच करके बाकी दिन घर पर बातें कर के बिताएंगे.”—श्यामली की आवाज़ में काफी उत्साह था, जिसे महसूस करके मैं मन-ही-मन मुस्कुरा दी.

“हाँ, मैं कल आ जाऊँगी. मगर ११.०० का शो नहीं देख पाएंगे. मेरे पहुँचने तक लेट हो जायेगा. एक काम कर, तुमदोनों मूवी देखते रहना, मैं मूवी के खतम होने तक बाहर घूमते रहूंगी. वैसे आना कहाँ पर है?”

“साउथ सिटी माल, तू आ जायेगी ना? और कोशिश कर कि साथ में मूवी देख सकें.”

“हम्म..... मुश्किल है दोस्त! तुम मेरी टिकट मत काटना. और साउथ सिटी माल तो मैं कभी गई नहीं हूँ. मगर आ जाऊँगी. नो प्रॉब्लम! ओके तो कल मिलते है, तुम्हारी मूवी खत्म होने के बाद.”—इतना कह कर मैंने झट से अपने एक सहयोगी से साउथ सिटी माल जाने के लिए आसान-सा रास्ता पूछने लगी. उसके द्वारा सुझाया गया रास्ता भी मजेदार था.

दूसरे दिन सुबह-सुबह ही निकल गई हावड़ा के लिए. लोकल ट्रेन से हावड़ा, वहाँ फेरी से बाबूघाट, थोड़ा पैदल भी, फिर एसप्लानेड मेट्रो स्टेशन से रविन्द्र सदन और अंतत: वहाँ से ऑटो लेकर मैं साउथ सिटी माल के सामने खड़ी थी.

अभी श्यामली को फोन करके सूचित करने ही वाली थी कि उसका एस ऍम एस आ गया. “उल्लू! क्या कर रही हो?”- इसे पढते ही लगा कि इसे क्यूँ नहीं बताया? फ़ौरन ही मैंने उसे जवाब में लिखा—“मैं साउथ सिटी माल में श्यामली के साथ हूँ. वह अपने फ्रेंड के साथ मूवी देख रही है और उसके बाहर आने में टाइम है तो मैं विंडो शॉपिंग कर रही हूँ. ;-)

तुम एक नंबर का उल्लू है. मुझे क्यूँ नहीं बताया? मुझे भी आने का मन है.”—उसका “मैसेज पढकर मैंने उसे फोन कर के कहा -–“मैं कैसे तुम्हें बुलाती? कायदे से श्यामली को तुम्हें बुलाना चाहिये न!”

“मैं आ रहा हूँ. अभी तो वो मूवी देख रही होगी न. तब तक तुम्हारे साथ रहूँगा.”—उसने इसके आगे मुझे बोलने का और कोई मौका ही नहीं दिया. थोड़ी देर में वह मेरे पीछे खड़ा था, मुझे डराने के लिए. एक दूसरे को देख हम फिर से एक बार खुश हुए. वह इधर-उधर ताँका-झाँकी करने से बाज नहीं आ रहा था, अब माल में अच्छे लोग तो दिखेगे ही उसे. उसके साथ मैंने कुछ खरीददारी भी कर डाली. तब तक मूवी खत्म होने का समय भी होने लगा था और उसका मन नहीं जाने का हो रहा था. मरती क्या करती? श्यामली को फोन करके झूठ बोलना पड़ा—“ सुन, अमृत ने फोन किया था अभी. उसे जब मैंने बताया कि हम यहाँ पर आये हुए है तो मुझसे शिकायत कर रहा था कि उसे क्यूँ नहीं बुलाया. उसकी भी छुट्टी है आज. मुझे समझ में नहीं आया कि उसे बुलाऊं या नहीं? इसलिए तुझे फोन कर रही हूँ कि तुम्हारा दोस्त है, सो अगर मन हो तो तुम ही उसे फोन करके बुला लो.”

श्यामली ने तुरंत हाँ कर दी और उसने उसे फोन करके बुलाया भी, उस वक्त हमदोनो एक रेलिंग में खड़े थे. अमृत भी खुश होके बोला कि वह आकर मुझसे मिल लेगा, जब तक उसकी मूवी चलती है.

“तुम्हारे लिए आज पहली बार मैंने अपनी सहेली से झूठ बोला है. और कितना बोलना होगा? राम राम राम राम.....”—मेरे ऐसा कहने पर वह हँस दिया.

उसका चॉकलेट फ्लेवर वाला पेस्ट्री लाना, यह सोच के कि मुझे पसंद होगा और उसकी इस बात को सच बनाने के लिए मेरा उसका बड़े मन से खाना, आज भी मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है. और तो और उसमें भी एक ही चम्मच से. उस वक्त तो अजीब ही लग रहा था, क्यूंकि मुझे एक ही प्लेट में खाना शेयर करना बिलकुल भी पसंद नहीं था.

थोड़ी देर बाद श्यामली और उसका दोस्त भी साथ हो लिए थे. लंच में भी उसने मेरे साथ बदमाशी की. मुझे और उसे ज्यादा कुछ खाने को मन नहीं था, तो उसने एक शाकाहारी प्लेट मंगवा लिया वो भी मुझसे बिना पूछे. फिर से एक प्लेट में खाना, और तो और मेरे हिस्से में चावल सरका देना वो भी यह कह के कि मैं रोटी खाऊँगा बिना मेरी मर्ज़ी पूछे, और अंत में मेरी प्यारी मिठाई को भी गप्चा जाना, उस वक्त मुझे उसका सिर फोड़ने का मन हो रहा था. और खुद पे गुस्सा भी कि कोई मुझ पर इस तरह हुकुम कैसे चला सकता है?

शाम होते-होते हम और श्यामली वापस साल्ट लेक चले आये और वह दोनों अपने-अपने मुकाम पर. दूसरे दिन भी जनाब को आने का मन कर रहा था तो सुबह-सुबह ही आ गया. मैंने उस दिन नूडल्स बनाये थे, वह जल्दी से खत्म करके मुझे “और दो” का इशारा करने लगा. “पेटू कहीं का! सब खा लिया. पहले मेरे पाक-कला पर दोनों ही डरे जा रहे थे और अब पूरा चट कर डाला.”—फिर भी मुझे अच्छा लगा उसे खिला कर. उस दिन दोपहर का खाना भी मैंने ही बनाया. रसोई में उसने मेरी जरूरत से ज्यादा मदद करने की कोशिश की. जिसे सोच-सोच कर मैं डरे जा रही थी कि मेरी दोस्त क्या समझेगी? मगर फिर भी उसका यूँ साथ देना बहुत अच्छा लग रहा था. हम दोनों फिर भी लड़ने में लगे हुए थे. उस पर मेरा ऊँगली का कट जाना और उसका इश्श्श...... करके मेरी तरफ चेहरा बनाकर देखना – किसी फ़िल्मी सीन से कम नहीं था.

रात होने से पहले उसे अपने बेस में लौटना था. मैं उसे जूतों के लेस बांधते वक्त बड़े ध्यान से देख रही थी और सोच रही थी कि इसमें ऐसा क्या है? इसे जाने देने का मन ही नहीं करता!

वह फिर सीढ़ियों से उतरता उस मोड़ पर गायब हो गया, तो मन ने उस मोड़ की दीवारों से बड़ी जोर से प्रार्थना कि वो एक बार के लिए हट जाएँ तो उसे और थोड़ी दूर तक जाता हुआ मैं देख सकूँ. पता नहीं किस आस से उस मोड़ पे अब भी निगाहें टिकाये खड़ी थी की कि वह पीठ को पीछे की ओर झुकाते हुए मेरी तरफ हाथ हिला रहा था. उसकी उस शैतानी-भरी मुस्कराहट पर मैं भी हँस दी कि सही में उन दीवारों को मेरी आवाज़ सुनाई देती भी है! या इस दिल की आवाज़ को वह भी सुन लेता है कभी-कभी!
       

5 comments:

वन्दना said...

बहुत बढिया लिखा है बिल्कुल धाराप्रवाह्।

abhi said...

"लव आज कल " बड़ी अच्छी चल रही है..

पहला पैराग्राफ कुछ ज्यादा पसंद आया...थोड़ा बहुत कविता सा लगा...

और वो चोकलेट पेस्ट्री की बात,...हम्म... यकायक कुछ याद आ गया.. :)

Sunil Kumar said...

vicharon ko kalam ka sahara dena to koi aapse sikhe , bahut sundar

संजय भास्कर said...

क्यूट स्टोरी...
ZARI RAHE VANDNA JI...

Vandana ! ! ! said...

वंदना जी पोस्ट को पसंद करने के लिए शुक्रिया, आते रहिएगा, यह कहानी कुछ कड़ियों में है.

अभि जी, जो भी याद हो आया हो , लिख डालिए!

सुनील जी कोशिश तो यही रहती है कि मन को उकेर दूँ किसी तरह से भी. और लिखना पढ़ना यह शौक बचपन से ही मिली हुई है. चौथे वर्ग से ही अपनी दीदी की किताबें पढ़ा करती थी.

संजय जी पसंद करने के लिए शुक्रिया, कहानी ज़ारी रहेगी.