Tuesday, December 21, 2010

एक भेंट तुम्हारी खुशी का इक हिस्सा बनने के लिए मेरी तरफ से.

आज कुछ ऐसा लिखने को मन हो रहा है, जिसे मैं किसी और को खुश होते देख महसूस कर रही थी. यूँ तो उम्र में वह मुझसे काफी छोटा है, मगर उसके साथ मेरी बहुत निभती है. मुझे पता है अभी अगर वो यह पढ़ेगा तो मुझसे इस बात के लिए जरूर लड़ेगा कि उम्र का अंतर बताना जरूरी था क्या? और मैं हँस दूँगी, कहूँगी कि छोटा है तो छोटा जैसे रह. इस बात पर वह और तिलमिलाएगा, शायद कुछ देर के लिए ही सही, एक बार फिर कुर कुर हो जायेगी. ये कुर कुर शब्द भी उसी ने इजाद किया है, मगर फिर भी हर कुर कुर की एकमात्र कारण उसे मैं ही लगती हूँ. आज उसका प्लेसमेंट हुआ है, और इस बात पर मैं उसे कौन सी मिठाई खिलाऊँ, यही नहीं समझ आ रहा है. कारण बस यही कि वह मुझे मिठाई खाने से रोकता है, मेरे गुड़ वाले रसगुल्ले पर नज़र गडा के रखे रहता है. मेरे मन में तब उसके लिए सबसे ज्यादा गालियाँ निकलती है क्यूंकि I love गुड़ का रसगुल्ला. तब मैं अपने मोटापे को लेके चिंतित होना छोड़ देती हूँ और एक झूठा मगर प्यारा-सा वादा खुद से कर लेती हूँ कि कल से दौडना शुरू कर दूँगी. मेरे इस दौड़ने के प्रण पर मेरी एक सहेली ने भी कह डाला है कि अगर मैं लगातार सात दिनों तक दौड़ने के लिए सुबह उठना शुरू कर दूँ तो बदले में वो मुझे अपनी तरफ से बाहर खिलाने ले जायेगी, हालाँकि इस बात को हुए ३ साल होने को आये है और मुझे अब तक वो लजीज खाना नसीब नहीं हुआ है. हाँ तो यह पोस्ट लिखने से पहले मैंने यही सोचा कि उसे ये पोस्ट लिख के दे दूँ, मेरी तरफ से बधाई के लिए. मेरे पास सिर्फ शब्दों के कुछ मोती बोलो या पत्थर-कंकड़ ही पड़े है, जो उसे भेंट स्वरुप दे सकती हूँ. पिछले कई दिनों से वह काफी परेशान था. एक के बाद एक कंपनी में छंटने के बाद उसमें गुस्सा भर रहा था जैसे कि उसके साथ ही ऐसा क्यूँ हो रहा है? इस दौरान उसने काफी कुछ सीखा होगा, यह मुझसे ज्यादा भला कौन जान सकता है. और मैं भी यही चाहती थी कि कुछ सबक मिलने के बाद ही उसे कुछ मिले, तब शायद वह उस मोती की कीमत को भली भांति समझ सकेगा और उसे अच्छे से संभाले रखेगा.

तुम आज सोच रहे होगे न कि मैं क्या लिखने वाली हूँ इस पोस्ट में. ज्यादा कुछ नहीं, बस बीते पलों में से कुछ को फिर से सजाने की कोशिश ही कर रही हूँ.

याद है जब तुम पहली बार ट्रेक में जाने से पहले मिले थे तो तुमने बस में सबका फोटो लिया था और हम दोनों, नीतू और मुझे, उस फ्रेम से निकाल दिए थे. मुझे बुरा लगा था, और उस समय तुम्हें नहीं जानते हुए भी मैं धीरे से बुदबुदाई थी कि रुक अभी पूरा ट्रेक बाकी है. अभी तुम हँस रहे होगे कि बाप रे ये लड़की कितनी बड़ी होकर भी छोटी-छोटी बातों को दिल से लगाये रहती है. तो मैं  तुम्हें बता दूँ कि मैं इंसान हूँ और इंसान जैसी ही सोचती हूँ. उसके बाद जब ये पता चला कि तुम्हें ही कहा गया है हम दोनों का ख्याल रखने को तो मन ने एक बार कहा कि हम खुद से रख लेगे इससे अच्छा.

फिर जब स्टेशन के बाहर खड़े थे और नीतू को वाश-रूम जाना था, और तुम्हें मैं बोलने गई थी कि हमारा इंतज़ार करना तो तुम्हारा दो टका-सा जवाब कि अभी ही जाना था, उस बात पर तुम्हें उस समय बहुत सुनाने का मन किया था. मगर फिर सोचे कि इनकी बुद्धि इससे ज्यादा बढ़ नहीं सकती और मैं बिना कहे वापस चली आई.

स्टेशन में ट्रेन का इंतज़ार करते वक्त ही तुम थोड़े ढंग के लगे जब तुमने कहा कि हमलोग बात क्यूँ नहीं कर रहे है. कुछ ऐसा ही कहा था तुमने.

फिर पता नहीं कैसे तुम मुझसे बातें करने लगे थे, शायद उस टी.टी. के कारण, वरना हम कभी इतना बात ही नहीं कर पाते. ट्रेन में जब मैं दूसरे बोगी में बैठे बाकियों से बातें कर रही थी तब तुम आकर मुझे बोले थे कि अपने बर्थ में चलो वहाँ नीतू अकेली बैठी है और उस समय मुझे पता लगा कि तुम मेरी गैरमौजूदगी को मिस कर रहे थे. इस बात पर मैं मन-ही-मन हँस दी थी कि जनाब सीधे भी रहते है कभी-कभी. फिर सब जब अपने अपने बर्थ में सो रहे थे, तब तुम और मैं ऊपर वाली आमने-सामने बर्थ पर कुछ भी बातें किये जा रहे थे. तुम अपनी बचपन की बातें भी बताने लगे थे और मैं सुन सुन कर सोच रही थी कि यह मुझे कैसे बताने को राज़ी हो गया. हा हा हा.

बागेश्वर में याद है जब छत में धूप सेंकने गए थे हम, तो तुम अपनी कुछ बातें बोल गए थे और मैं चुपचाप से नीचे आ गयी कि इसे मैं ही मिली थी सुनाने के लिए. बहुत ठंडी थी और मैं नहा के निकली थी जब तुमने ये फोटो लिया था.

उसके बाद तो हम तीनों ने बड़े मजे से गुजारे. वो ट्रेक की पहली रात जब हम खाती पहुँच कर टेंट लगा के सोये थे. तुम्हें याद है हम पीछे रह गए थे और एक बच्चे ने हमे गलत रास्ता बता दिया था और हम गांव से होते हुए फिर अपने साथियों से मिले थे. तब चौहान जी बच्चों से बतियाते हुए मिले थे. उस समय मैंने ये फोटो क्लिक कर लिया था.

 फिर अपना टेंट खुद लगाना, उसके बाद रात को हम सब आग जला के एक-दूसरे के बारे में बताकर कर चिढा रहे थे. उस पर से चौहान को प्रवीण ने खूब सताया था और हम और नीतू चुपचाप से सुने जा रहे थे कि कब आग खतम हो और हम जाए अपने-अपने टेंटों पर. मुझे नींद नहीं आ रही थी और नीतू को तो ठण्ड ही लगे जा रही थी. फिर सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गई थी और मैं तुम दोनों को उठाने लगी थी. तुम उठ नहीं रहे थे तो मैं तुम्हें पुराने हिंदी गानों की रंगोली सुनाने लगी थी, जिसे सुन के बाकी सब उठ गए थे और तुम फिर भी नहीं उठे. तब तुम्हें मार-मार के उठाना पड़ा था मुझे. मगर तुम नाराज़ भी नहीं हुए थे. फिर टेंट से बाहर निकलते ही एक सफ़ेद रंग की प्यारी सी कुतिया मेरे पास आके खड़ी हो गयी थी. उस समय तो वह मुझे किसी देवदूतनी से कम नहीं लग रही थी. और मैंने उसके साथ कुछ फोटो भी खिंचवाए थे.



तुमको पानी पीना होता था तो या तो मेरे हाथ से या नीतू के हाथ से पीते थे. तुम्हारी तो रईसी थी उस समय. और वो झरने का पानी कितना मीठा होता था न! हम एक दूसरे से इतना घुल मिल गए थे कि कभी भी कोई अलग काम नहीं किये न. और वो प्रवीण, तुम, मैं और नीतू का ४ बजे उठ कर उस घर वाले का पीने वाला लोटा लेके भाग जाना, आज भी याद आता है तो हँसी आ जाती है.

सफर में जब जाने के वक्त तुम सब नदी में नहाने के लिए कूद पड़े थे और हम बस बाहर से तुमलोगों को मजे करते देख रहे थे तो मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था कि हमने अपने सब कपड़े आगे क्यूँ भिजवा दिए. और वापसी में हमने अपनी जिद पूरी भी की थी नहाने की. और तुम बहुत गुस्सा कर रहे थे, क्यूंकि तुम अकेले ही पहरेदारी में लगे थे. उस समय मेरा फोटो भी तुमने बहुत गंदे से लिया था देखो तो, बीच में घास-पत्ती भी डाल दिए.  

और यह याद है न जब हम पिंडारी के चोटी पर थे. उस वक्त सच में बहुत अच्छा लग रहा था. हमने अपने ग्रुप (ग्रुप ई) को E-people नाम दिया बोले तो equal people.


ट्रेक के बाद फिर तुम्हारे घर भी चले जाना, और तुम्हारे घर में तो सबको अजीब भी लगा होगा कि मनीष की दो दोस्त वो भी लड़की घर आ रही है. वो दो दिन तुम्हारे घर में बिताए हुए बहुत ही अच्छे पल थे. ताजमहल के सामने तांगेवाले को हटाकर खुद को बैठाना और फोटो लेना कितना अच्छा लग रहा था सब. और वो ताज को देखने के बाद मेरा कहना कि ताज जैसा वाला फीलिंग नहीं आ रहा है.




चलो ये अब बातें तुमसे और नहीं करुँगी नहीं तो तुम बोर हो जाओगे और मैं भी बताते-बताते. कुछ और बताते है तुम्हारे बारे में. जैसे कि तुम्हें गाल में थपकी भी देना तुम्हारे इगो को चांटा लगाने जैसा होता है ये मैंने तब जाना जब तुमने मेरा हाथ इतना जोर से मरोड़ा था कि मैं रो पड़ी थी. तुमको मुझपे गुस्सा आता है कि मैं तुमसे शिकायत क्यूँ नहीं करती, हक क्यूँ नहीं जमाती और अपने समझदारी का सारा टोकरा तुम्हारे सिर पर ही क्यूँ डालती हूँ वगैरह-वगैरह. मैं कैसे बताऊँ कि मैं ऐसी ही हूँ.  तुम्हारे साथ मेरी लड़ाई ही ज्यादा होती है, और फिर तुम २-४ दिन तक कोप-भवन में बैठे रहोगे. फिर जब उस कोप भवन से आप निकलोगे तो तुम फिर से सोचने लग जाओगे कि ऐसा क्यूँ होने लगा है? पहले तो ऐसा नहीं था. अब मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है. मुझे पता है तुम्हें मुझ पर इतना गुस्सा आता है कि तुम्हारा मन करता होगा कि इस लड़की का गला दबा दूँ? हैं न!

और हाँ! उस दिन तुम जो फोन पर मेरी बातें सुन कर मुझे इतना सुनाये थे ना, उस बात का बदला मैं हर दिन गिन-गिन के और धीरे-धीरे लूँगी तुमसे. समझे न! दूसरी बार बोला तो मैं तुम्हारे सारे बाल नोच लूँगी.

तुम्हारे साथ मेन बिल्डिंग में लैपटॉप में मूवी देखना बहुत अच्छा लगता है. और कभी-कभी तुम मुझे सुलाने के लिए स्क्रीन के उस पार से हाथ से थपथपाते हो तो सच्ची बोलूं तो नींद आ जाती है.

मगर मुझे तुम्हारा फोन काटना बिलकुल भी बर्दाशत नहीं होता. तुम गुस्से में बिलकुल गंदे लगते हो, जिसे मन करता है कि दो-चार लगा दूँ तो ही शायद अकल आये.

और जब तुम धीरे-धीरे खाना खाते हो तो भी बहुत चिढ़ आती है क्यूंकि तुम्हारे स्पीड से खाना खाऊंगी तो मेरी भूख भी खतम हो जाती है. और मुझे स्पून फीडिंग बिलकुल भी पसंद नहीं जो तुम अक्सर चाहते हो. मन करता है कि पूरा चम्मच भी खिला दूँ. समझे?

हाँ मगर तुम चाय मुझसे जल्दी पी जाया करते हो और मेरे गिलास से भी ले लेते हो. अब तो मुझे आदत हो गयी है कि जब भी तुम्हारा गिलास खतम हो तो अपने में से थोड़ा भर देना.

मगर मुझे हँसी भी आती है जब तुम्हें हाथों से चावल खाना बिलकुल भी नहीं आता. तब मन करता है कि तुम्हें चिढ़ाऊं कि आई.आई.टी. के स्टूडेंट को इतना भी नहीं आता.

तुम जब १० मिनट की देरी पर चिल्लाते हो तो मुझे भी चिल्लाने का मन करता है कि भाड़ में जाओ किसने बोला है वेट करने को.

और अब तो मुझे भी पता चल गया है कि तुम मुझसे भी झूठ बोला करते हो. पहले मुझे कैसे सुनाया करते थे कि तुम्हारी तरह नहीं हूँ. आ गया ऊंट पहाड़ के नीचे! हे हे.

और हाँ जब तुम दूसरों से चिढ़ के कुछ उल्टा-पुल्टा बोलते हो और उसके बाद मेरे से जो सुनते हो और उसके बाद तुम्हारा मूड ऑफ इस बात पे हो जाता है कि तुम मेरे मजाक को भी कितना गन्दा बना देती हो और मुझे ही नीचा दिखाती हो. तब मैं कितनी बार तुम्हें समझाती हूँ कि मेरे कहने का ऐसा मतलब हरगिज़ नहीं था. मगर तुम तो अपने सिवा कभी सुने भी हो. तब लगता है कि किसी दीवार में जाके अपना सिर फोड़ लूँ.

तुम्हारा वो एक ही डांस स्टेप मुझे अच्छा लगता है, भले ही तुम उसी को बार-बार क्यूँ न करो. लेकिन जब तुम रोड में चिल्लाते हो हो तो मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. तब लगता है किस सिरफिरे से पंगा ले लिया. तुम्हारा कभी-कभी किसी बात को लेके जिद करना, उफ्फ्फ कभी-कभी लगता है मेरे जैसा ढीठ प्राणी भी इसके आगे हार जाता है क्या?

चलो बहुत हो गया लिखना, बस इतना कहूँगी कि मैं जानती हूँ तुम अलग राह के हो और मैं दूसरी ही राह की. फिर भी वक्त के इस मोड़ में थोड़ी देर के लिए मिलना भी बहुत अच्छा लगता है. यहाँ से निकलने के बाद तुम कहीं भी जाओगे मुझे जरूर याद करोगे और मैं......हम्म्म्म मेरे पास इतना टाइम नहीं है हे हे. चल हो गया बहुत. गुड नाईट!

52 comments:

ZEAL said...

.

वंदना जी ,

बेहद ख़ूबसूरती से लिखा हुआ है ये संस्मरण। तसवीरें भी अच्छी लगीं। ख़ास कर घास-पत्ती के पीछे वाली। Smiles !
पढ़कर अपने College-days याद आ गए।
मज़ा आ गया।

.

shekhar suman said...

:)
वंदना जी...
क्या कहूं..?? कुछ कहने के लिए बचा ही नहीं...अब तो मन कर रहा है वापस कॉलेज भाग जाऊं...:)
शायद ये दिन सबसे खूबसूरत होते हैं...और खासकर जब कोई इतने अछे दोस्त बन जायें...
बहुत ही खूबसूरती से लिखा है आपने, एक एक पंक्ति में एक अपनापन झलक रहा है....
और फोटू तो लाजवाब....:)
शुभकामनाएं...

saanjh said...

awwww......sooooo sweet :)
badi pyaari yaadein hain, aur vo sardi thi, naha ke aayi thi wala fotu ;) was sooooo cute ;)

amar jeet said...

वंदना जी बहुत खूब वर्णन किया आपने collage के दिनों की यादो को तजा कर दिया आपने !क्या दिन थे जब N.S.S.(राष्ट्रीय सेवा योजना)के 10 दिवसीय शिविर में ऐसे ही टेंटो में रहकर जो आनंद आता था एक एक चित्र आपके संस्मरण को पढ़कर अखो के सामने आ गया !मै तो इसे पढ़कर अपने COLLAGE के दिनों की फोटो ही लेकर बैठ गया फिर मुझे याद आया की आज बहुत से काम है खैर यादो को मन में संजोये जल्दी जल्दी तैयार होकर निकलना पड़ा .....................

यशवन्त माथुर said...

वन्दना जी!आपने पुरानी जींस का वो गाना सुना है न...."यादें यादें बस यादें रह जाती हैं....कुछ छोटी मोटी बातें रह जाती हैं...."
बस ये यादें ही रह जाती हैं हमारे साथ.

आपकी इन बातों से मुझे भी कुछ बातें याद आ गयीं.
खैर आप लिखती बहुत अच्छा हैं.

रश्मि प्रभा... said...

kitni pyaari dilkash yaaden hain ...

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

वंदना जी, इस जीवंत दास्‍तान को पढ कर सचमुच मजा आ गया। साथ ही दु:ख भी हो रहा है कि आपकी लेखनी के प्रताप से अब तक कैसे अछूता रहा।

आपके ब्‍लॉग को फॉलो कर लिया है, अब कमेंट के द्वारा आपको परेशान करते रहेंगे।

---------
आपका सुनहरा भविष्‍यफल, सिर्फ आपके लिए।
खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में आप क्‍या जानते हैं?

संजय भास्कर said...

वंदना जी...
शेखर की तरह मेरा मन कर रहा है वापस कॉलेज भाग जाऊं..

संजय भास्कर said...

वंदना जी के तो फैन है हम ........क्या लिखती है लाजवाब

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढ़िया संस्मरण लिखा है। अच्छा लगा।तस्वीरे भी बहुत बढ़िया हैं।

Mukesh Kumar Sinha said...

college ke din........hote hi aise hain.........aur kuchh lamhe jarur yaadgaar ban jate hain, ye alag baat hai iss baat ko koi ladki jayda sahej kar vyakt kar paati hai..:)

hai na Vandana jee.............

waise aapne apne dil ke aiine me sabko ko dikha kar uss aine ko hamare samne rakh diya aisa lagta hai...
bahut khub

Mukesh Kumar Sinha said...

waise aapne apne dil ke aiine me sabdo ko dikha kar uss aine ko hamare samne rakh diya aisa lagta hai...
bahut khub

shekhar suman said...

वंदना जी....
मेरे ब्लॉग पर..
हाँ मुसलमान हूँ मैं.. ..

वन्दना महतो ! said...

@दिव्या जी, धन्यवाद ब्लॉग पर आने के लिए. आपको ये घास पत्तों वाली अच्छी लगी, जबकि मैं उस फोटो को देखने के बाद गुस्सा हुई थी कि मेरा फोटू क्यूँ खराब कर दिया. :)

@शेखर: जो मन में आ रहा है कर डालो. ये मेरा मंत्र है तुम्हारे लिए. हे हे. हाँ कॉलेज के दिनों को याद करना एक सुखद अहसास ही तो है.

@सांझ: thanx dear!!!!!

@अमरजीत जी: उन यादों को संदुकची से बाहर निकालिए और खुली हवा में रहने दे. निश्चय ही आपको नयापन का अनुभव होगा. ऐसी यादें हमसे भी साझा कीजिये.

@ यशवन्त: अरे ये गाना किसने नहीं सुना होगा. मगर यादों के साथ याद आने वाले लोगों को भी साथ लेकर चलना चाहिये. थोड़ा मुश्किल है मगर नामुमकिन तो नहीं.

@ रश्मि जी:आप हमेशा मेरे पोस्ट को पढ़कर टिप्पणी देती जरूर है. मेरे लिए इतना समय निकालने के लिए तहे दिल से शुक्रिया कहना चाहूंगी.

@जाकिर जी: इसमें दुःख कैसा? देर आयद दुरुस्त आयद! मगर आपको एक बात बता दूँ, शुरू में सबको प्रताप लगता होगा, मगर मेरे केस में आपको प्रताड़ना भी लग सकती है. अब तो संभल के रहिये आप. हम भी आपको फोलो कर रहे है. वैसे धन्यवाद ब्लॉग में आने के लिए.

वन्दना महतो ! said...

@संजय जी: रहने दीजिए आपको सिर्फ मन ही करेगा. अब आप एक बार भाग के आईये तब ही हम मानेगे. just kidding! आजकल तो मन करना भी बड़ी बात हो गई है. यादों को सहेज के रखे भी और समय-समय पर उन यादों से उनका हाल-चाल पुच भी लेना चाहिये कि क्यूँ भाई सब ठीक-ठाक है ना. हे हे

@परमजीत जी: बहुत धन्यवाद आपका!

@मुकेश जी: @ye alag baat hai iss baat ko koi ladki jayda sahej kar vyakt kar paati hai..:)

इसका मतलब यही मान कर चलूँ ना कि लड़कियां अभिव्यक्ति के मामले में सकुचाती है.

एक बात बोलूं, लड़कियां बड़ी अजीब होती है, कई बार बड़ी से बड़ी बात पचा जाती है और कई बार छोटी छोटी चीजों को भी पचा नहीं पाती. बोलिए है ना अजीब!

महेन्द्र मिश्र said...

बढ़िया संस्मरण ... बहुत अच्छा लगा ...

महेन्द्र मिश्र said...

कालेज के बीते दिन मुझे भी याद आ गए ... आह क्या दिन थे वो ....

POOJA... said...

इतनी प्यारी यादों को share करने का बहुत-बहुत शुक्रिया...
आपके दोस्त को ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएं...
और इस पोअत को पढ़कर मुझे अपने एक दोस्त की याद आ गयी.. सच कहूँ तो रोना आ गया...
वाकई दोस्ती बहुत ख़ास रिश्ता होता है ज़िंदगी का...

संजय भास्कर said...

लगता है वंदन जी आप मानेगी नहीं चलो बताइए कहा आना है अब तो लगता है भागना ही पड़ेगा ....जब दोस्त ने कहा है तो भाग ही लेते है
.... अच्छे दोस्तों का कहना ज़रूर मानना चाहिए
अच्छे दोस्त बहुत ही मुस्किल से मिलते है
सभी तस्वीरे बहुत ही बढ़िया हैं।

abhi said...

ओहो वंदना...कितनी खूबसूरत लिखा है...मजा आ गया, और उसपर से फोटो भी, कमाल :)

बस एक ही मलाल रह गया, की हमारी कभी ऐसी ट्रिप नहीं हुई, कुछ अलग परिस्थितियां थी हमारे कॉलेज में,कभी बाद में बताऊंगा :)

कोफ़ी पीते पीते ये पोस्ट पढ़ रहा हूँ,
सुबह बना डाली इस पोस्ट ने :)

smshindi said...

वंदना जी
आपके ब्लाग आकर मुझे तो खुश मिली है अगर आपको भी मेरी ब्लाग आकर खुश मिले तो अपने आपको खुदकिस्म्त समजूगा और अपने विचारों से हमें अवगत कराएं धन्यवाद...

smshindi said...

"समस हिंदी" ब्लॉग की तरफ से सभी मित्रो और पाठको को एक दिन पहले
"मेर्री क्रिसमस" की बहुत बहुत शुभकामनाये !

()”"”() ,*
( ‘o’ ) ,***
=(,,)=(”‘)<-***
(”"),,,(”") “**

Roses 4 u…
MERRY CHRISTMAS to U

वंदना जी,

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है!

Kunwar Kusumesh said...

संस्मरण प्यारा है .फोटो भी सुन्दर सुन्दर.बस थोड़ा lenthy हो गया

mahendra verma said...

रोचक संस्मरण।
एक ही सांस में पूरा पढ़ डाला।
चित्र भी काफी सुंदर हैं।

yogendra said...

आपको क्रिसमस की शुभकामनाये

JAGDISH BALI said...

very interesting and fascinating.

Dorothy said...

क्रिसमस की शांति उल्लास और मेलप्रेम के
आशीषमय उजास से
आलोकित हो जीवन की हर दिशा
क्रिसमस के आनंद से सुवासित हो
जीवन का हर पथ.

आपको सपरिवार क्रिसमस की ढेरों शुभ कामनाएं

सादर
डोरोथी

राज भाटिय़ा said...

हम तो इअतना ही कहे गे कि हमे बहुत अच्छा लगा, ओर सारी पोस्ट एक सांस मै ही पढ गये, धन्यवाद.वेसे गुड हमे भी बहुत स्वाद लगता हे, जब कि मां कहती थी फ़ोडे होंगे बरसात मै, लेकिन कभी नही हुये

Patali-The-Village said...

अच्छे दोस्त बहुत ही मुस्किल से मिलते है|
सभी तस्वीरे बहुत ही बढ़िया हैं। शुभकामनाएं|

अभिषेक मिश्र said...

प्रोफाइल और तस्वीरों ने भी प्रभावित किया. दोस्ती को समर्पित सुन्दर पोस्ट. बधाई.

Kunwar Kusumesh said...

मजेदार संस्मरण. तस्वीरों ने मन मोह लिया.

sada said...

बहुत ही खूबसूरती से ही हर शब्‍द को व्‍यक्‍त किया है आपने ...सुन्‍दर पोस्‍ट ...।

sada said...

http://urvija.parikalpnaa.com/2010/12/blog-post_29.html
आज आपकी रचना वटवृक्ष पर है, देखिए ...रश्मि दी, आपको अस्‍वस्‍थ्‍य होने की वजह से सूचित नहीं कर सकीं ...।

Dorothy said...

रोचक, प्रवाहमयी और सुंदर संस्मरण के लिए आभार.
सादर,
डोरोथी.

Dorothy said...

रोचक, प्रवाहमयी और सुंदर संस्मरण के लिए आभार.
सादर,
डोरोथी.

संजय भास्कर said...

नए साल की आपको सपरिवार ढेरो बधाईयाँ !!!!

babanpandey said...

वटवृक्ष के माध्यम से आप तक पहुंचा
आपकी कविता पढ़ी लिंक भी लिया /
मैं मात्र छह माह से ब्लॉग लेखन कर रहा हूँ
मेरे ब्लॉग पर आकर मार्गदर्शन करे
आभारी रहूंगा //
http://babanpandey.blogspot.com

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

बहुत ही अच्छा सस्मरण............ सुंदर प्रस्तुति.
फर्स्ट टेक ऑफ ओवर सुनामी : एक सच्चे हीरो की कहानी

रमिया काकी

Harsh said...

sansmaran achcha lag.. nice blog

mahendra verma said...

नव वर्ष 2011
आपके एवं आपके परिवार के लिए
सुखकर, समृद्धिशाली एवं
मंगलकारी हो...
।।शुभकामनाएं।।

Dorothy said...

अनगिन आशीषों के आलोकवृ्त में
तय हो सफ़र इस नए बरस का
प्रभु के अनुग्रह के परिमल से
सुवासित हो हर पल जीवन का
मंगलमय कल्याणकारी नव वर्ष
करे आशीष वृ्ष्टि सुख समृद्धि
शांति उल्लास की
आप पर और आपके प्रियजनो पर.

आप को सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.
सादर,
डोरोथी.

डॉ० डंडा लखनवी said...

धन्यवाद! इतने मूल्यवान विचारों का
साझीदार मुझे बनाया।
नववर्ष की हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए!
सद्भावी--डॉ० डंडा लखनवी,

यशवन्त माथुर said...

आप को सपरिवार नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं .

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

आपको नववर्ष 2011 मंगलमय हो ।
ब्लाग पर आना सार्थक हुआ ।
काबिलेतारीफ़ है प्रस्तुति ।
आपको दिल से बधाई ।
ये सृजन यूँ ही चलता रहे ।
साधुवाद...पुनः साधुवाद ।
satguru-satykikhoj.blogspot.com

amar jeet said...

नव वर्ष की आपको बहुत बहुत शुभकामनाये

RAJEEV KUMAR KULSHRESTHA said...

बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।
हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद ।
धन्यवाद....
satguru-satykikhoj.blogspot.com

boletobindas said...

अगली पोस्ट????

Thakur M.Islam Vinay said...

वंदना बहन आपकी लेखनी वाकई काबिले तारीफ है और फोटोग्राफी का तो जवाब ही नहीं है मगर अफ़सोस एक बेहतरीन सूरत की मालिक हैं आप और दिमाग की जादूगरनी फिर भी आपने आप की अमानत पुस्तक नहीं पढ़ा जिसमे आपकी कामयबी छुपी हुई है

vijaymaudgill said...

shukr hai khuda ka ki bhoolapan abhi bhi bacha hua hai duniya par. aur samaj k sath sath meethi yadain bhi. sach main bahut hi acchi aur pyari lagi apki yadain. vaise jaise aap aur apki frnd gayi thi apne us dost k ghar aise hi meri bhi dono dost ayi thi mere ghar. aur meri taang kheech-2 kar mera jeena dhubhar kar diya tha dono ne.

PD said...

सुन्दर लेखन.. बधाई.. :P

rashmi ravija said...

बहुत ही अपनापन से लिखी प्यारी सी पोस्ट....पूरे समय मुस्कान खींची रही होठो पर...
सच, जितने भी दिन बिताए, साथ...नहीं भूलेंगे आप दोनों...

baabusha said...

Bandna,
After reading it, all I can say is, u r very cute n innocent !
I loved this diary write up n would like to read u again n again....n yeah, its very surprising u visit my blog stealthily...read me...write few lines n disappear ! :) Lovely girl !
God bless u.