Sunday, April 24, 2011

५ सेकेण्ड की तुम्हारी आवाज़


तुम्हारी आवाज़ आज भी सुनती हूँ तो लगता है जैसे मुझे मेरी कस्तूरी का ठिकाना मिल गया है, इसलिए तो उस विडियो में सिर्फ ५ सेकेण्ड का वो अंतराल मेरे लिए पूरी जिंदगी जैसी लगती है. उसमें तुम्हारी आवाज़ जो सुन पाती हूँ मैं! भले ही वो बातें मेरे लिए नहीं थी. मगर तुम्हारी वो खिलखिलाहट जिसे सुन के मन को बस लगता है कि और क्या चाहिए? जब तुम सामने प्रतीत-से होते हो तो एक पल के लिए मैं सब भूल जाती हूँ कि क्या-क्या हो गया इतने दिनों के लंबी चुप्पी में.

लोगों को तो कह देती हूँ बड़ी आसानी से कि बंद दरवाजे को देखना बंद करके खुली राहों को अपना लेना चाहिए. मगर यही समझदारी अपने पर आती है तो मैं बेवकूफ ही बनना पसंद करती हूँ. और क्यूँ नहीं देखूं उस बंद दरवाजे को जिसके उस पार तुम अब भी होगे, अपनी दुनिया के साथ. बस वो दरवाजा मुझे ये कड़वा अहसास दिलाते रहता है कि उस पार की दुनिया में मैं तुम्हारी कुछ भी नहीं. शायद वो दरवाजा नीम की लकडियों से बना होगा, कड़वा कहीं का. बस अगर तुम उस दरवाजे को छू देते तो उतना कड़वा भी नहीं लगता. मगर तुम शायद इस दरवाजे को भूल गए हो.

कभी सोचती हूँ कि क्यूँ दिखा तुम्हें यही दरवाजा और चले आये बिना पूछे. तुम जैसे कोई क्रिकेट की गेंद वापस लेने आये थे और चले गए. वो कांच जो टूट के ज़मीन पर गिरा था तुम्हारे जाने के बाद, वो गेंद से तो नहीं ही टूटा था. कुछ समय के टुकड़े अब भी उस जगह अपनी दाग बनाये रखे है, वो अब पुरानी निशानी-से लगने लगे है. गेंद से शायद मेरे घर की रौशनी रूठ गई थी, तभी तो तुम्हारे जाने का पता भी नहीं चला. एक लौ अब भी कोने में जलती रहती है, तुम्हारे जाने के बाद जलाया था मैंने कि अबकी बार आओ तो अपनी गेंद वापस ले जाना, मैंने उसे दरवाजे की कड़ी में ही टाँग दिया है. समय काफी बीत चला है, बरसात, गर्मी ठण्डी सब मौसम आके चले गए है. इसलिए हो सकता है कि तुम अपनी गेंद को पहचान न पाओ. एक पर्ची में तुम्हारा नाम लिखा है बिना अपने नाम के. उसे देख लेना तो समझ जाओगे कि गेंद अब भी तुम्हारी है, तुम अब भी उससे खेल सकते हो. मगर मैं दुबारा गेंद को वापस लौटा नहीं सकती, मेरे हाथों में कुछ कांच के टुकड़े अब भी चुभे रह गए है, हो सकता है समय की खरोचें तुम्हें भी लग जाये.

अब तुम कैसे आये और क्यूँ गए? यह सोचने में क्या रखा है? जो है उसे सोचती हूँ बस. दीवारों में परछाई अब भी दीखती है, तुम्हारे आने की, उसे निहारा करती हूँ. यादों के पलंग पर आज फिर से तुम्हारी आवाज़ सुन रही हूँ, नींद नहीं आने का गम फिर कम-सा लगने लगता है. ५ सेकेण्ड की तुम्हारी आवाज़ मुझे सच में कितनी बार उस दरवाजे से अंदर-बाहर करवाने लगती है.

16 comments:

रश्मि प्रभा... said...

यादों के पलंग पर आज फिर से तुम्हारी आवाज़ सुन रही हूँ, नींद नहीं आने का गम फिर कम-सा लगने लगता है. ५ सेकेण्ड की तुम्हारी आवाज़ मुझे सच में कितनी बार उस दरवाजे से अंदर-बाहर करवाने लगती है.
ise mahsoos kernewale kam hote hain

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मनोभावों का सुन्दर विश्लेषण!

mahendra verma said...

इसी तरह के पांच सेकंड कुछ के लिए ठहरा हुआ समय बन जाता है, ज़िदगी भर के लिए।
अच्छी प्रस्तुति।

अक्षय-मन said...

ये एहसास और ये विचार मन को छुते हैं ......
अक्षय-मन

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (25-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

देवेन्द्र पाण्डेय said...

एहसास जो सुख देते हैं।

दिगम्बर नासवा said...

Vo paanch sekend jaise jeevit kar diye hain aapne ... bahut hi lajawaab likha hai ...

Anand Dwivedi said...

कभी सोचती हूँ कि क्यूँ दिखा तुम्हें यही दरवाजा और चले आये बिना पूछे. तुम जैसे कोई क्रिकेट की गेंद वापस लेने आये थे और चले गए. वो कांच जो टूट के ज़मीन पर गिरा था तुम्हारे जाने के बाद, वो गेंद से तो नहीं ही टूटा था. कुछ समय के टुकड़े अब भी उस जगह अपनी दाग बनाये रखे है, वो अब पुरानी निशानी-से लगने लगे है. गेंद से शायद मेरे घर की रौशनी रूठ गई थी, तभी तो तुम्हारे जाने का पता भी नहीं चला. एक लौ अब भी कोने में जलती रहती है, तुम्हारे जाने के बाद जलाया था मैंने कि अबकी बार आओ तो अपनी गेंद वापस ले जाना,
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aap to vandana ji bas rula hi dete ho !

मनोज कुमार said...

इसे पढने के बाद एक लम्बी सांस खींचा ... और ....

उसने कहा कौन सा तोहफा मैं तुम्हे दूँ
मैंने कहा वही शाम जो अब तक उधार है


वो भी शायद रो पड़े वीरान कागज़ देख कर
मैंने उनको आखरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं
-----बस-----!

संजय भास्कर said...

आदरणीय वन्दना महतो जी
नमस्कार !
बस अगर तुम उस दरवाजे को छू देते तो उतना कड़वा भी नहीं लगता. मगर तुम शायद इस दरवाजे को भूल गए हो.
....सुन्दर विश्लेषण अच्छी प्रस्तुति।

संजय भास्कर said...

एक बेहतरीन अश`आर के साथ पुन: आगमन पर आपका हार्दिक स्वागत है.

संजय भास्कर said...

ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.....वन्दना जी

रजनीश तिवारी said...

बड़ी आसानी से कि बंद दरवाजे को देखना बंद करके खुली राहों को अपना लेना चाहिए. मगर यही समझदारी अपने पर आती है तो मैं बेवकूफ ही बनना पसंद करती हूँ....jindgi ek khwab hai...bahut achchi rachna

amrendra "amar" said...

एहसास मन को छुते हैं ...........

अच्छी प्रस्तुति।

निवेदिता said...

no words to appreciate your feelings .....

Kailash C Sharma said...

कोमल अहसास अंतस को कितने करीब से छू जाते हैं...