Monday, July 11, 2011

सोचा है कभी?

कूड़े के ढेर में
सपने चुननेवाले
वो नंगे पांव
बिन मांगे
रोगी बन जाते है;
और रोग बांटनेवाले
अब भी बाज़ारों में
प्लास्टिक की थैलियाँ
मांगते है.

सोचा है कभी?

दाने-दाने को
तरसती है
अब भी
कितनी ही अंतड़ियाँ;
और दाने-दाने में
नाम भी नहीं
ढूँढ़ पाती है,
कई घरों की थालियाँ

सोचा है कभी?

दूर सुदूर गाँव के
के चरवाहे बच्चे
नेत्र-जल जला के
क ख ग लिखते है;
क्यूँकि सरकार निकम्मी है
और हम पंखें-बत्ती
बंद करना नहीं जानते है.

सोचा है कभी?

अखबार में
एक पूरा गांव
आर्सेनिकयुक्त जल से
लकवाग्रस्त बताया गया है;
और आईने में देखते हुए
टूथब्रश चलते है,
नल तो बैकग्राउंड म्यूजिक
के लिए चलाया गया है.

सोचा है कभी?

एक हताश किसान
खेत में खड़ी
लहलहाती फसल को
कैसे उजाड़ता होगा;
कैसे तब जा के
किसी धनीजन का
मनचाहा व आलीशान
स्वप्नमहल बनता होगा.

सोचा है कभी?

ग्लोबल वार्मिंग
का दोष एक तरफ
जंगल का कटना
माना जा रहा है;
और इसी बात पर
जागरूकता का हुंकार
उसी जंगल से बने
कागज पर लिख कर
भरा जा रहा है.

सोचा है कभी?

एक गुल्लक पैसा
जब कुछ सांस
खरीदने में अक्षम-से
प्रतीत होते है;
तब ही शायद
सैमसंग टचस्क्रीन
के बाजारू भाव
गिरे हुए-से लगते है.

सोचा है कभी?

देश को प्रगति
के चक्के में
सवार करने की
कोशिश करते रहते है;
और स्व-पतन की
राह पर अक्सर
हम चक्षु-सहित भी
अंधे करार किये गए
बने फिरते रहते है.

सोच के देखना.....

15 comments:

सुज्ञ said...

पर्यावरण चिंतन का चित्र उपस्थित करती जागरूक अभिव्यक्ति!!

Dr.Nidhi Tandon said...

अक्सर यही सब सोचती हूँ इसलिए लोग मुझे पागल कहते हैं...इस वक्त एक ही बात सोच रही हूँ कि लिख दूं ...वंदना तुम अच्छा लिखती हो..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर
____________________________________

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

नहीं इस तरह से सोचना सबके वश की बात नहीं है.हमें पहले अपने एसी कमरों और सुख सुविधाओं से फुर्सत तो मिल जाए जो कभी मिलेगी नहीं.फिर इस तरह से सोचना समय की बर्बादी ही तो कहा जायेगा न; इस बात से अनजान बन कर कि आम आदमी की मेहनत का फल उसे न मिलकर 'किसी और को' मिल रहा है.
आपने इस तरह से सोचा इसके लिये आपको बहुत बहुत धन्यवाद.
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कल 12/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Kailash C Sharma said...

बहुत मर्मस्पर्शी...भावों की गहराई और उनका बहुत सुन्दर चित्रण..

संजय भास्कर said...

वंदना जी
नमस्कार !
पर्यावरण चिंतन पर जागरूक करती
इस कविता का तो जवाब नहीं !
विचारों के इतनी गहन अनुभूतियों को सटीक शब्द देना सबके बस की बात नहीं है !

वन्दना said...

यही तो कोई सोचना नही चाहता…………बेहतरीन कहा है।

संजय भास्कर said...

 अस्वस्थता के कारण करीब 20 दिनों से ब्लॉगजगत से दूर था
आप तक बहुत दिनों के बाद आ सका हूँ,

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

गहन बातों कि ओर इंगित करती अच्छी और विचारणीय रचना

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

कितनी ही अंतड़ियाँ;
और दाने-दाने में
नाम भी नहीं
ढूँढ़ पाती है,
कई घरों की थालियाँ

सुंदर पंक्तियाँ,रचनाकार को अभिव्यक्त कर गईं.

Ravi Rajbhar said...

ohhh
dukhati rag par hath rakh diya apne

Neeraj Dwivedi said...

Bahut accha likha hai aapne...

दिगम्बर नासवा said...

बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती है आपकी रचना ... पर इस तेजी के युग में किसको फुर्सत है ..

manish bhagwani said...

socha hai kabhi...
50-50 tshirt leke log jeete hai aur 7-8 pair reebok shoes lete hai aur kahan kisi ke pass chappal bhi nahi hoti...socha hai kabhi....

कविता रावत said...

sach yah sab dekhkar to dukh hi hota hai... sabhi agar in vishyon par dhayan den to kitna achha hota!

bahut kuch sochne par majboor karti rachna....
jaagrukta ka yah andaanj bahut achha laga...
Jaagrukta bhari prastuti ke liye aabhar!