Monday, June 18, 2012

मन के कीड़े


जबसे देखा है
लाल चींटियों को,
उस मरे कीड़े को,
साथ ले जाते हुए:
तबसे सोचती हूँ,
कि कब आएगें
मेरे मन के
दरवाजे पे भी,
समय की चींटियाँ,
मन में जनमने
वाले कीड़े को
ले जाने के लिए,
कब तक उनके
मरने का और
इंतज़ार करेंगे?
ये कमबख्त
मरने का नाम
भी क्यूँ नहीं लेते?
कब मन
इनसे खाली
हो पाएगा?
और कब मैं
इन यादों को
ख़त्म कर दूँगी?
कब इनको भी
चींटे लग जाएगे?

10 comments:

expression said...

यादों का कीड़ा न कभी मरता है न उसको चीटे खाते हैं........
वो कीड़ा हमें ही खा जाता है भीतर ही भीतर.......

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (19-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Mukesh Kumar Sinha said...

कब इनको भी चींटे लग जाएगे?
man ke keero ko chinte nahi lag pate.. wo to aise hi idhar udhar bhagta rahta hai:)

प्रवीण पाण्डेय said...

सबको लेकर जाने वाला, एक न एक दिन आयेगा।

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

@ expression: आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ। पर कौन चाहता है कि ये कीड़ा हमें भीतर से खोखला कर दें?

@ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक: इसे शामिल करने के लिए तहे दिल से धन्यवाद!।

@ मुकेश कुमार सिन्हा: सही में ये इतने भागते रहते है की पूछिए मत। वैसे हम भी इनके पीछे भागते रहते है।

@ प्रवीण पाण्डेय: वो एक दिन का इंतज़ार ज़िंदगी बन जाती है न!

ana said...

ytharth se parichit karaya apne.....ati sundar

दिगम्बर नासवा said...

यादों के कीड़े मरने के साथ ही मरते हैं ... इनको चींटे नहीं लग पाते ...

Amrita Tanmay said...

बहुत सुन्दर ...

Noopur said...

yado ke kide ko kabhi mar nahi sakta koi. . .sundar rachna

संजय भास्कर said...

@ नासवा जी बिलकुल सही खा है
यादों के कीड़े मरने के साथ ही मरते हैं

संजय भास्कर