
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."
इक कोने से सटी, दूर दरवाजे को घूरते ही रही,
कोई तो उनमें-से आये, जिनके हिलते-डुलते से साए किनारों से थी झलक रही.
पर शायद किसी ने उस चुटके को,
नहीं पढ़ा था, जो दरवाजे से थी चिपकी हुई कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."
कान फिर बंद कर लिए मैंने, उन पदचापों को नहीं सुनने के लिए;
झुकती पलकें भी साथ देने लगी कुछ भी नहीं देख पाने के लिए;
और पैर के अंगूठे से मैं इस अहसास को भी दबाने में तुली हुई कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."
तभी कहीं से जब छनकर पहुँच रहा था मुझ तक कोई उजाला,
तब शायद मैंने देखा न था खिड़की का जाला.
उठे हुए कदम ठिठक-से गए, उठी जहाँ से मैं
उसी कुर्सी पे फिर-से पसर गई और मैं लिखती रही,
बस लिखती रही कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."
शाम होते-होते खिड़की भी बंद कर दी गई,
कहीं से आती ठंडी हवाओं से मैं सख्त न हो जाऊँ
सो मैंने चादर ओढ़ ली कि ठण्ड बहुत बढ़ गई.
बाहर चाँद आज भी अपने गंतव्य की ओर गतिमान था,
शायद उसे इस ठण्ड का ज़रा-सा भी न गुमान था.
यह सोच मैंने अपनी चादर उसकी ओर लहरा दी
कि ठण्ड बहुत है और रात भी काफी बाकी.
शायद मेरा भी मन अन्दर से डर रहा था कहीं,
सदियों से सख्त होते-होते वो भी दरकने लगा था मेरी तरह ही.
" कोई नहीं कमरे में उसके, वो भी बंद रहा;
मैं भी बंद रही, कमरे में ही पड़ी.."
ठण्ड (अभिप्राय:) रिश्तों में बढती शुष्कता
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