Thursday, August 20, 2009

बादल भी रोने लगे...........

अचानक तंद्रा टूटी तो देखा
दरवाजे से बाहर,
काले बादल दौड़ते हुए चले आ रहे थे
मेरी तरफ.
कोई अप्रत्याशित घटना
अभी-अभी घटित हुई हो जैसे,
व जिसकी सूचना मुझे देने
बदहवास-से आ रहे हो ऐसे.
मैं भी शंकित-सी, भयभीत-सी
दौड़ के चली गई बरामदे तक,
पूछने को कि क्या हो गया?
कौन-सा आसमान गिर गया?
प्रश्न करूँ इससे पहले ही
ढेर सारी बड़ी-बड़ी तितलियाँ,
जिन्हें हम बचपन में
"हेलीकाप्टर" की संज्ञा दिया करते थे,
बादलों की विपरीत दिशा में
भागे जा रही थी; जैसे
काले भूत को देख लिया हो.
शायद बादल की बदहवासी का
गहरा असर हुआ था उन पर.
मैं चिल्लाई कि क्या हुआ?
मगर दूरी इतनी भी कम न थी
कि वो मुझे समझ पाई
और न ही मैं उत्तर जान पाई.
बस प्रतीक्षा करने लगी कि
वो पास आके दम तो ले ले ज़रा.
इतने में पंद्रह चीलें,
मैंने ठीक से ही गिना था,
आसमान में अचानक से आ गए.
जैसे कि आज ही उनका व्यायाम-सत्र
आरंभ हुआ हो.
कभी इक ही धुरी पर
चकरी बन घूमने लग जाते
तो कभी कतार बना के
जाने किन्हें लुभाते.
ऐसा भी लगा कि
सुनामी आने से पहले की
चेतावनी दे रहे हो.
अब बस कुछ ही पल की दूरी बाकी थी,
मुझमे और बादलों में.
मैं भी भूमिका बाँधने लगी
मन-ही-मन कि पूछूँ कैसे?
होंठ लरजते इससे पहले
बेईमान हवा ऐसी आई
अपने संग बादलों को भी ले गई उड़ा.
अनुत्तरित होकर मन के सारे प्रश्न
जब रोआंसें-से होने लगे.
तब दूर जा के देखा तो
बादल भी रोने लगे.

2 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

दिल को छू लेने वाली सुन्दर रचना
---
मानव मस्तिष्क पढ़ना संभव

Sandeep said...

very nicely composed