Sunday, September 26, 2010

कम अकेली.....


दूर झरोखे से बाहर
मेरे हॉस्टल का एक छत है,
जिसमें मैं अक्सर रात-बे-रात
गोल-गोल घुमा करती हूँ.
उसके पीछे पेड़ों के झुंड से
अक्सर मुझे किसी के
होने का अहसास मिलता है.
मैं जानती हूँ कि ये
मेरा सिर्फ भ्रम भर ही है.
मगर इस भ्रम में ही मुझे
यह अहसास भी मिलता है
कि मैं उस परछाई से
कम अकेली हूँ.

3 comments:

संजय भास्कर said...

बेहतरीन , अपनी ही कशमकश का सजीव चित्रण

संजय भास्कर said...

dil ko choo lene walo rachna...

thanks svandan ji

Udan Tashtari said...

क्या बात है..खूब कहा!