Monday, December 13, 2010

तुम

कभी-कभी उन सभी कोशिकाओं
को ढूँढने का मन करता है,
जिनमें तुम्हारी यादें बस गई हो.

सिर्फ इतना जानने के लिए
कि तुम और कितने
याद आने बाकी रह गए हो .

रोज रोज सोचती हूँ कि
अब तो बहुत हो चुका, पर नहीं
तुम अब भी नहीं चुके हो.

जाने कैसे याद आते रहते हो,
जाने क्या – क्या तुम
उन कोशिकाओं में रख गए हो?

हर सुबह दुगुने हो जाते हो,
जैसे मुझे “ न भुलने की ”
- कोई मीठी कसम दे गए हो.

कोशिका-द्विभाजन की
यह विशेषता जतला कर
हाँ! तुम सच में अमृत बन गए हो.

28 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

वाह!क्या लिखती हैं आप भी :)

बेहतरीन!

कुश said...

याद कोशिकाओ में और फिर उसका विभाजन.. कमाल का थोट है.. मैंने पहले नहीं पढ़ा.. गुड वन

Kailash Sharma said...

रोज रोज सोचती हूँ कि
अब तो बहुत हो चुका, पर नहीं
तुम अब भी नहीं चुके हो.

बहुत खूब...कोमल भावों से परिपूर्ण एक सुन्दर प्रस्तुति...

Kunwar Kusumesh said...

कोशिकाएं ढूँढने के लिए डॉक्टर की ज़रुरत होगी.

रश्मि प्रभा... said...

हर सुबह दुगुने हो जाते हो,
जैसे मुझे “ न भुलने की ”
- कोई मीठी कसम दे गए हो.
aapki kalam jadui hai yaa aap?

monali said...

Very different... mitosis,meiosis sab yaad aa gaya :D

Aur ske siwa bhi bahut kuchh yaad aa gaya... uski yaadein bhi kahin gahre basi hain,...har kavita se jhaankte dikh jati h :)

The Serious Comedy Show. said...

anokhee rachnaa.apratim.

Unknown said...

हर सुबह दुगुने हो जाते हो,
जैसे मुझे “ न भुलने की ”
- कोई मीठी कसम दे गए हो.

कोशिका-द्विभाजन की
यह विशेषता जतला कर
हाँ! तुम सच में अमृत बन गए हो.


nice lines Vndana.... :)

Anonymous said...

oh my my.....itni scientific yaadein pehli baar padhi hain...too good dear :) kya socha hai, bas kamaal hai

सदा said...

वाह ...बहुत खूब .....सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

स्वप्निल तिवारी said...

अद्भुत ...एक नयापन है इस कविता में ..जो अमूमन ब्लॉग जगत में नहीं मिलता ... कोशिका विभाजन पर लिखी गयी नज़्म पहली बार पढ़ी ... थोड़ी बड़ी होती अगर ..तो यादों के प्रोफेस, मेताफेस से भी गुजार जाते हैं ... हे हे हे ..पर नज़्म बहुत अच्छी है

संजय भास्‍कर said...

शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

संजय भास्‍कर said...

नए पुराने ब्लोगरो हेतु ब्लोगिंग टिप्स..
नई पोस्ट पर आपका स्वागत है

सोमेश सक्सेना said...

वियोग में विज्ञान का तड़का। अच्छा प्रयास है।
मेरे विचार से कोशिका की जगह न्युरॉन्स प्रयोग करना चाहिए था क्योंकि हर कोशिका में तो स्मृति भंडारण होता नहीं। बाकी आपकी इच्छा।

दुष्यंत कुमार का एक शेर याद आ गया आपकी कविता पढ़कर-

सहने को हो गया इकट्ठा इतना सारा दुख मन में
कहने को हो गया कि देखो अब मैं तुमको भूल गया

सोमेश
शब्द साधना

hot girl said...

nice poem,

lovely blog.

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

@ यशवन्त: जी सहृदय धन्यवाद आपका.

@ कुश: मेरा शोध कार्य इसी से संबंधित है ना! इसीलिए यह थोट आ गया.

@ कैलाश जी आभार आपका.

@ कुसुमेश जी इसके लिए डॉक्टर होता भी है भला!

@ रश्मि जी: न कलम न मैं, आप पाठकों के स्नेह का जादू है बस.

@ मोनाली: यादें है, शक्लें तो बनाएगी उसकी.

@ unkavi: धन्यवाद आपका.

@ राहुल, सांझ, सदा जी: थैंक्स!!!!!

महेन्‍द्र वर्मा said...

कोशिका-द्विभाजन की
यह विशेषता जतला कर
हाँ! तुम सच में अमृत बन गए हो।

...अनूठे बिम्बों से सजी अनूठी कविता।

Thakur M.Islam Vinay said...

पांच लाख से भी जियादा लोग फायदा उठा चुके हैं
प्यारे मालिक के ये दो नाम हैं जो कोई भी इनको सच्चे दिल से 100 बार पढेगा।
मालिक उसको हर परेशानी से छुटकारा देगा और अपना सच्चा रास्ता
दिखा कर रहेगा। वो दो नाम यह हैं।
या हादी
(ऐ सच्चा रास्ता दिखाने वाले)

या रहीम
(ऐ हर परेशानी में दया करने वाले)

आइये हमारे ब्लॉग पर और पढ़िए एक छोटी सी पुस्तक
{आप की अमानत आपकी सेवा में}
इस पुस्तक को पढ़ कर
पांच लाख से भी जियादा लोग
फायदा उठा चुके हैं ब्लॉग का पता है aapkiamanat.blogspotcom

Thakur M.Islam Vinay said...

पांच लाख से भी जियादा लोग फायदा उठा चुके हैं
प्यारे मालिक के ये दो नाम हैं जो कोई भी इनको सच्चे दिल से 100 बार पढेगा।
मालिक उसको हर परेशानी से छुटकारा देगा और अपना सच्चा रास्ता
दिखा कर रहेगा। वो दो नाम यह हैं।
या हादी
(ऐ सच्चा रास्ता दिखाने वाले)

या रहीम
(ऐ हर परेशानी में दया करने वाले)

आइये हमारे ब्लॉग पर और पढ़िए एक छोटी सी पुस्तक
{आप की अमानत आपकी सेवा में}
इस पुस्तक को पढ़ कर
पांच लाख से भी जियादा लोग
फायदा उठा चुके हैं ब्लॉग का पता है aapkiamanat.blogspotcom

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

prem ka jaiv vagynik vishleshan..
naya prayog..
ati sundar...

अनुपमा पाठक said...

हर सुबह दुगुने हो जाते हो,
जैसे मुझे “ न भुलने की ”
- कोई मीठी कसम दे गए हो.
sundar!

स्वप्न मञ्जूषा said...

bahut hi sundar likhti ho tum...
man khush ho gaya padh kar..aise hi likhti raho..dua hai meri..

Avinash Chandra said...

बहुत ख़ूबसूरत लिखा है आपने... अच्छा लगा इसे गुनना

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

@ स्वप्निल जी: किसी भी प्रोसेस में क्यूँ न चले जाये हम, यह रहस्य तो हमेशा बने रहेगा और इसके पीछे हम घूमते ही रहेगे. पसंद करने के लिए शुक्रिया आपका.

@संजय जी धन्यवाद और हम जरूर से आयेगे आपके ब्लॉग पर भी.

@सोमेश जी: "सहने को हो गया इकट्ठा इतना सारा दुख मन में
कहने को हो गया कि देखो अब मैं तुमको भूल गया"----- वाह! क्या बात कही है आपने.
वैसे न्यूरोन्स भी एक तरह की कोशिका ही है, जो मेमोरी के संचित करने के लिए जिम्मेदार होती है.

@hot girl: thank u dear!

@ महेंद्र जी, सुरेन्द्र जी व अनुपमा जी आप सबों का बहुत आभार!

@ अदा जी: अदा जी आपका आशीर्वाद मिल गया और क्या चाहिये! बहुत बहुत धन्यवाद!

@अविनाश जी : शुक्रिया आपका! आते रहिएगा

vijay kumar sappatti said...

great poem.... each word has its own meaning .. kudos .

an regular aaunga aapke blog par.

dhnaywad.

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

विजय जी, आपका सहृदय धन्यवाद और स्वागत भी है मेरे ब्लॉग में!

PD said...

पूरा पोस्ट कमेंट के साथ पढ़ने के बाद जो बात मन में आयी वही पूछ रहा हूँ..

पाँच लाख एकवां व्यक्ति तुम बनी कि नहीं बनी? :-)

वन्दना महतो ! (Bandana Mahto) said...

@prashant: abhi tak to nahi..... aur isse jyada puchna bhi mat!