Showing posts with label Poem. Show all posts
Showing posts with label Poem. Show all posts

Monday, July 9, 2012

वह मुझसे पूछता है.....


वह मुझसे पूछता है,
इक दिन, बड़े दिनों के बाद;
क्या तुम परेशान हो,
इन दिनों?

मैं घूरती हूँ,
अपनी आँखों की
परछाईयों को,
नीले दीवार पर।

एक सदी जैसा
पल गुजरने के बाद,
मैं कहती हूँ,
हाँ, शायद या पता नहीं।

फिर उस सदी जैसे
पल को पीछे भेज कर,
मैं उससे पूछती हूँ,
ऐसा क्यूँ पूछे तुम?

तुम्हारे लिखे शब्द
देखे थे मैंने,
कुछ दिनों पहले -
ऐसा कुछ वह मुझसे कहता है।

मैं हँस कर
सोचती हूँ,
क्यूँ लिख कर
ज़ाहिर होती हूँ?

और मैं फिर से किसी
गर्त में डुबकी लगाकर,
साँसों का घुटना
जारी कर देती हूँ।


Friday, June 29, 2012

अपने मन की बात.....


नीली दीवार पर
आईने का चौकोरपन,
नहीं बाँध पाता
मेरे अंदर का खालीपन।

इस्त्री किए हुए
सभी कपड़ों के बीच,
मैं छुपा नहीं पाती
अपने मन का सच।

ये घड़ी की सुईयां
इतनी भी नहीं नश्तर,
कि फेंक सकूँ मैं
जो भी बचा मेरे अंदर।

एक टंगा लाल झोला या
गुच्छे चाबियों का सारा,
नहीं है तो बस वो कील जिसे
समझ सकूँ मन का सहारा।

कैलेंडर में दीखता तो है
मौसम का बदलना,
फिर क्यूँ रुका हुआ है,
यादों का यहाँ से जाना।

बिस्तर में तकिया
ही सोता है पूरी रात,
मैं चादर की सिलवटों में
लिखती अपने मन की बात।

Thursday, June 28, 2012

तुम अब भी.....

मैंने आज फिर से
तुम्हारा प्रोफ़ाइल देखा है,
तुम अपने इस नई तस्वीर में
और भी अच्छे लगते हो।


मैं तुम्हारे गालों को
अब ज्यादा महसूस करती हूँ,
तुम पहले - से कुछ और 
मोटे हो गए - से लगते हो।


ये सफ़ेद-काले धारियों वाले
मफ़लर में तुम्हारी आँखें
और भी चमकने लगी है,
तुम्हारे ड्रैक्युला वाले दाँत
तुम्हें और भी जादुई बना देती है।


मैं इस जादू से तब से
अब तक सोयी नहीं हूँ,
मैं तस्वीर के नीचे तारीख में
इस जादू का बनना ढूँढती हूँ।


और वो लाल रंग का 'ज़ुरिक' बस,
बगल में, यह जताने लगता है,
कि तुम अब भी उस रंग में
उतने ही अच्छे लगते हो।



Monday, June 18, 2012

मन के कीड़े


जबसे देखा है
लाल चींटियों को,
उस मरे कीड़े को,
साथ ले जाते हुए:
तबसे सोचती हूँ,
कि कब आएगें
मेरे मन के
दरवाजे पे भी,
समय की चींटियाँ,
मन में जनमने
वाले कीड़े को
ले जाने के लिए,
कब तक उनके
मरने का और
इंतज़ार करेंगे?
ये कमबख्त
मरने का नाम
भी क्यूँ नहीं लेते?
कब मन
इनसे खाली
हो पाएगा?
और कब मैं
इन यादों को
ख़त्म कर दूँगी?
कब इनको भी
चींटे लग जाएगे?

Thursday, March 8, 2012

इक ही रंग.....


मैं तुम्हें सिर्फ
इक ही रंग
दे सकती हूँ।

तुम जब भी
अपने गालों को छुओगे,
देखना, कुछ प्यार-सा रंग
हाथ में भी आ जाएगा।

जो आँखों से छलके
अपनों से दूरियों का एहसास,
ममता के रँग में रँगा
इक आँचल तुम्हें हवा कर जाएगा।

जो होगे कभी
यूँ ही उदास तुम,
यह भी दुख की स्याही से
लिखा हुआ कोई अक्षर
बन जाएगा।

जो कभी द्वेष मन में सँजोये,
उद्वेलित होने लगो तुम,
तो यह भी क्रोध के तम में
जलकर आग बन जाएगा।

तुम जिस भाव से
इसे लगाओगे,
उस भाव में निहित
रँग ही बस
उभर कर आएगा।

इसलिए हाँ !
मैं तुम्हें सिर्फ
इक ही रँग
दे सकती हूँ।

Sunday, February 19, 2012

'तुम', 'याद’, 'समय' व ‘गाँठ’


उधड़ी हुई जिंदगी के अवशेषों में से
एक ‘तुम’ जैसा उच्चारित शब्द
अब भी उस बटन की भाँति
आधा टंका, आधा लटका - सा,
समय के कुछ क्षीण - से पलों में
बिंधा गया था जो कभी मेरे मन से,
तुम्हें 'याद' शब्द से बाँधे हुए तो है;

मगर उसके बीच ‘समय’ शब्द के
बारम्बार उच्चारण से उत्पन्न
सदियों जितनी लंबी दूरी से बने धागे के
एक सिरे से जुड़े ‘तुम’ शब्द का
समय के उस परिधि में छूट जाना,
जो सूर्य के अनगिनत फेरे लेने पर भी
पृथ्वी को दोबारा हासिल नहीं होती,
व दूसरे सिरे का हाथों में ‘याद’ शब्द से
बने अनगिनत लकीरों में उलझ कर,
‘तुम’ शब्द से जुड़े रहने की जद्दोज़हत में
‘गाँठ’ शब्द, जैसे प्रेम का कोई मज़बूत आकार,
में निरन्तर परिवर्तित होते रहना;

यह महसूस कराते रहता है कि
‘तुम’ और ‘याद’ शब्द के बीच
बंधे इस फ़ासले को समेट कर
खतम करने की कोशिशों में
इन गाँठों की गिनती सदैव बढ़ती ही रहेगी.

Saturday, April 4, 2009

मैं 'कस्तूरी मृग'....

तुम मौसम भी होते,
तो इंतज़ार रहता
बार-बार तेरे वापस आने का.

तुम परछाई भी होते,
तो अहसास रहता
हर पल तेरे पास होने का.

तुम तनहाई भी होते
तो मन करता
तेरी बाँहों में लिपट के सो जाने का.

तुम ख्वाब भी होते,
तो जी करता
तुझको आँखों में बसा लेने का.

तुम महावर भर भी होते,
तो रंग तुम्हारा ही रहता
तन-मन के हर कोनों का.

तुम स्याही भी होते,
तो लिखती हर जीवन-अध्याय
नाम होता तेरा मेरे हर पन्नों का.

तुम खुशबु भी होते,
तो छुपा लेती नाभि में
मैं 'कस्तूरी मृग' चाहूँ तुझमें ही में खोने का.

Monday, March 30, 2009

समय फ़िर पीछे लौट आया है....

खवाबों के झूठे प्यालों में, मैंने
पिया है तेरी यादों का जाम
फ़िर-से.
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।

देखूं मैं तुझको संग अपने,
चलने लगी तेरे हाथों को थाम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।

प्यार-भरी बातें भी होने लगी,
तेरी बाहों में पिघलने लगी मैं, जैसे कोई मोम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है ,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।

मिलने की खुशियाँ फ़िर बढ़ने लगी,
और जवां भी होने लगी हर पिछली कसम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।

साथ ये जो सदा रहता ऐसी किस्मत
अपनी कहाँ, जुदा हो ही गए हम
फ़िर-से।
देखो सपने में भी तुझको अलग पाया है,
समय भी क्या कभी पीछे लौट पाया है.

Thursday, March 5, 2009

मेरी प्यारी पड़ोसन...

*someone asked me to describe the sweetness about one of my fnd when I introduced her as "my sweet padosan"... n I said----
"भंवरों को होती रहती मुश्किल, मंडरते रहते आस-पास ऐसी मधुर वाणी...
वो चंचल-चित्त व आँखों में लिए हुए है मीठी शरारतों की कई निशानी...
चले जिस पग से, छोड़ जाए इक मीठी-सी गुदगुदाती कोई नर्म-सी कहानी...
चंदा भी मीठी-मीठी बातें करे देख उसके मन का सुन्दर रूप, चांदनी को भी होती परेशानी..."

Wednesday, March 4, 2009

चलो अच्छा हुआ तुम चले गए तो...



दर्द छिपाने की कोशिश में मैं क्या न करती गई।
कभी धूल के बहाने सच को पोंछती गई,
कभी होठों में झूठ के सौ रंग भरती गई।
कोई शिकायत नहीं, सबको बस यही कहती गई,
दूसरों में जब गिनाने लगे, तो तुम्हारा
परिचय भी मैं परायों में करती गई।
यही दस्तूर है जब सबकी खुशियों का,
तो मैं कंटीली राह ही सही, पर चलती गई।
नहीं मानती अब भी मैं ऊपरवाले को,
अपनी किस्मत को मैं ख़ुद ही लिखती गई।
कल तुम्हारा साथ लिखा था , आज उन्हीं
हथेलियों में बिछोह की लकीर खींचती गई।
क्या समझोगे तुम इस पीड़ा को, तुमको
जानने में जब सदियाँ भी मुझे कम लगती गई।
चलो अच्छा हुआ तुम चले गए तो,
कुछ दुनिया देख ली, कुछ समझदारी भी आती गई।

Tuesday, March 3, 2009

तुझको क्या अब कहूँ मैं.....



ये कैसा ज़लज़ला है,इस दिल में
हर पल जो उफ़नता रहता है.
कभी आँखों से बहता है,
कभी दिल से रिसता रहता है.

तुझको क्या अब कहूँ मैं,
दिल तो बस रोता रहता है.
कैसे यकीन कर डाला तुझपे,
ये कह के हँसता रहता है.

तेरी कीमत क्यूँ आंकी इस
दिल से मेरे,यही अफ़सोस अब रहता है.
अहसासों की कदर न रही जहाँ,
सरेआम बस तमाशा अब बनता है.

दर्द के इस तूफ़ान में फंस न जाए
कहीं तू भी मेरी तरह,
अपनी किस्मत से अब यूँ डर-सा लगता है.
इसलिए तेरे आँसू भी रख लिए
अपनी चादर के तले,
कि इस दर्द का असर तुझ-पर भी फ़ैल सकता है.

Saturday, February 21, 2009

ज़िन्दगी कोई मुश्किल भी तो नहीं.....



तनहा ज़िन्दगी मुश्किल भी तो नहीं,
यादें गर मिट जाएँ जेहन से.
रेतीले बादल-सी ख्वाब
मेरे हर पल को जो बदलती रहे.
बर्फ से भी ज्यादा जमा है,
मेरे दिल का कोना-कोना.
खुले दरवाजे का अब डर नहीं,
कि ठंडी आहों का बवंडर
इस टूटे-से दिल से चुपचाप गुजर जायेगी.
हाँ ज़िन्दगी यूँ ही पलकों में बिसर जायेगी.
पल-पल में समायी हुई हर वो तमन्ना,
पन्नों-सी बिखर जायेगी; जब
आँधी कोई आएगी, हाँ तब मिट जायेगी.
बचे-खुचे जज्बातों को आंसू धो डालेंगे,
या नहीं तो फिर दिल की आग में जरूर ही जल जायेगे.
हाँ, यूँ ही बीत जायेगी, ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी, मुश्किल भी तो नहीं...
कोई धुंधली पड़ी कांच का टुकड़ा तो नहीं,
जो हाथ फिराने से दुबारा दिख पड़ेगी;
कफ़न भी उड़ जायेगा चेहरे से मेरे
आँखों को पढ़ने से पहले ऐसे मैं बंद कर लूँगी.
हाँ, जिंदगी मुश्किल भी तो नहीं...
मुश्किल तो मौत को आने में है,
दरमियां अभी कई पल बाकी है जिसके;
पल जो सब ये बीत जायें तो,
ज़िन्दगी कोई मुश्किल भी तो नहीं.....

दिल की आवाज़



एक आवाज आई;
धडकनों से मेरे खेलती,
दिल को छू जाती.
खिलखिलाती-सी,
वो हँसती मेरे जज्बातों पे,
वो रोती मेरे अंजामों पे.
मैं जो कहती तो वो फिर-से दुहराती,
मैं जो चुप रहती तो सारे ज़माने की सुना करती.
कभी ताकत तो कभी कमजोरी
कभी दुश्मन तो कभी दोस्ती की नाज़ुक-सी वो एक डोरी.
मुझको मुझ-ही से मिलाती,
कभी मुझको ही चुरा जाती.
एक आवाज़ पूछती है,सोचती है;
हर कदम जो मैंने उठाये,
हर सितम जो मैंने भुलाये,
क्या सही क्या गलत
जानूँ क्या मैं?
अब तो वो ही बताये.
एक आवाज़ कह रही है;
ये गलत तो नहीं है.
झूठी है वो बहुत
ऐन वक़्त पर ही दे जाती है दगा;
फिर भी न मिला मुझे उस-सा सगा.
एक आवाज़ फरियाद करती है-
"मुझे दिल में ही रहने दो,
तेरा दिल है मेरा रैन-बसेरा.
आँखों से न कभी उतरने दो,
लगाना सदा पलकों का घेरा.
कि ज़माने की धार तेज बहुत है
और तेरा दिल बड़ा-ही नाजुक है."

Thursday, February 19, 2009

मैं कौन हूँ?



मेरे चाहतों के बादल
तैरते है, सदा मेरी आँखों में.
मैं हूँ प्यासी, उन अधरों की तरह
जिन पर आँसू बनकर ये कभी बरस नहीं पाते....

मैं हूँ तनहा, इन बेशुमार
तारों की चमकीली दुनिया में.
मैं गगन का वो टूटा हुआ तारा हूँ,
जो खुद को भी रोशनी दे नहीं पाते....

है तो तमन्ना मेरी, ऊंची इतनी
कि इस जहाँ से परे, उस जहाँ में.
मैं वो पंछी हूँ, जो पिंजरें में बंद नहीं,
फिर भी कभी ऊंची उडानें भर नहीं पाते....

रेत की तरह फिसल जाती है,
आके ख़ुशी मेरी मुठ्ठी से.
मैं वो सूखा रेगिस्तान हूँ,
जो किसी को भी तो दिशा दे नहीं पाते....

सपने चूर-चूर हो जाते है,
दिन के उजाले में.
मैं तो वो बेनूर ख्वाब हूँ,
जो रातों को भी मन बहला नहीं पाते....

मैं कौन हूँ? एक सवाल बनकर
रह गया है, इस व्योम में.
मैं खुद को कैसे पहचान लूँ,
जब साए भी अपने बन के रह नहीं पाते....

मेरी ख़ुशी



दूसरो से क्या कहूँ, क्या सुनूँ,
उन्हें क्यूँ भला किसी की चिंता हुई.
अपने मन की हालत मैं ही जानूँ,
मकड़ी के जाल में मैं जकड़ी हुई.

हैं मंजिल अपनी, अपनी है राह,
कांटें भी मेरे लिए ही बिछी हुई.
तो दूसरों से किस बात की है चाह,
अपनी किस्मत तो अपने लिए ही बनी हुई.

किसी भुलावे में आकर भटक न जाऊँ,
इस अहसास से भी मैं डरी हुई.
किस रास्ते को मैं अपना बनाऊँ,
इसी पशोपेश में मैं पड़ी हुई.

आसमां को छूना है, तारों को चूमना है,
न ऐसी तमन्ना मेरे दिल में कभी हुई.
मुझे तो बस अपने पैरों पे खड़ा होना है,
चाहे लाख मुसीबत हो मेरे पीछे पड़ी हुई.

उनकी कसौटियों पे खरा उतरना है,
जिनकी आशाएं मुझसे है जगी हुई.
मुझे हर हाल में उन्हें खुश रखना है,
मेरी ख़ुशी मेरे अपनों में ही बसी हुई.

जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....



जब कभी-भी मैं खुद को तनहा पाती हूँ,
सपनों की दुनिया में यूँ खो-सी जाती हूँ.
पलकों को बंद करके, दुनिया से बेखबर होके,
ख़्वाबों के ताने-बाने बुना करूँ.
जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....

सोचती हूँ गर मैं बन जाऊँ चिड़िया,
जी-भर के देख लूँगी तब ये सारी दुनिया.
बादल से करूँ शिकायतें, घोंसलों पे डाले क्यूँ आफतें,
बन के उन्मुक्त गगन में यूँ ही उड़ा करूँ.
जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....

कभी मैं बन जाऊँ नदिया की बहती धार,
अपने समंदर के लिए ले जाऊँ भेंट हज़ार.
खेलूं मैं अठखेलियाँ, संग पर्वत मेरी सहेलियां,
लहरों के संग जीने की तमन्ना करूँ.
जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....

बन जाऊँ हवा तो मस्ती में झूम लूँ,
बागों में खिले हर फूल को चूम लूँ.
कलियों से संग करूँ छेड़खानी, कभी यहाँ तो कभी वहां जानी,
बन के झोंका प्यार का यूँ ही बहा करूँ.
जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....

है तमन्ना मेरी कि तारों की तरह टिमटिमाऊँ,
छोटी-ही सही पर सारे जग को जगमगाऊँ.
देखूं दूर आकाश से, लेकिन अपने प्रकाश से,
भटके हुए राही को राह सही दिखाया करूँ.
जाने क्या-क्या मैं सोचा करूँ....

बंद कमरा



" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."

इक कोने से सटी, दूर दरवाजे को घूरते ही रही,
कोई तो उनमें-से आये, जिनके हिलते-डुलते से साए किनारों से थी झलक रही.
पर शायद किसी ने उस चुटके को,
नहीं पढ़ा था, जो दरवाजे से थी चिपकी हुई कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."

कान फिर बंद कर लिए मैंने, उन पदचापों को नहीं सुनने के लिए;
झुकती पलकें भी साथ देने लगी कुछ भी नहीं देख पाने के लिए;
और पैर के अंगूठे से मैं इस अहसास को भी दबाने में तुली हुई कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."

तभी कहीं से जब छनकर पहुँच रहा था मुझ तक कोई उजाला,
तब शायद मैंने देखा न था खिड़की का जाला.
उठे हुए कदम ठिठक-से गए, उठी जहाँ से मैं
उसी कुर्सी पे फिर-से पसर गई और मैं लिखती रही,
बस लिखती रही कि -
" कोई नहीं कमरे में मेरे, मैं बंद रही कमरे में ही पड़ी.."

शाम होते-होते खिड़की भी बंद कर दी गई,
कहीं से आती ठंडी हवाओं से मैं सख्त न हो जाऊँ
सो मैंने चादर ओढ़ ली कि ठण्ड बहुत बढ़ गई.
बाहर चाँद आज भी अपने गंतव्य की ओर गतिमान था,
शायद उसे इस ठण्ड का ज़रा-सा भी न गुमान था.
यह सोच मैंने अपनी चादर उसकी ओर लहरा दी
कि ठण्ड बहुत है और रात भी काफी बाकी.
शायद मेरा भी मन अन्दर से डर रहा था कहीं,
सदियों से सख्त होते-होते वो भी दरकने लगा था मेरी तरह ही.
" कोई नहीं कमरे में उसके, वो भी बंद रहा;
मैं भी बंद रही, कमरे में ही पड़ी.."


ठण्ड (अभिप्राय:) रिश्तों में बढती शुष्कता

प्लेटफार्म



शायद समय की रेल की रफ़्तार आज बहुत तेज है,
या तेज है दर्द किसी के छूट जाने का.

सामान तो ठीक से बांधा था मैंने,
फिर वो क्या था?
जो पीछे छूट गया.
कहीं खुद को ही ठीक बांधना नहीं भूल गई मैं
जल्दबाजी में.

शायद समय की रेल की रफ़्तार आज बहुत तेज है,
या तेज है दर्द किसी के छूट जाने का.

कुछ इसी तरह के पशोपेश में,
न जाने मैंने कितने मुकाम पार कर लिए.
फिर क्यों लग रहा है कि
जैसे अभी पिछले स्टेशन से ही तो चली थी मैं.

शायद समय की रेल की रफ़्तार बहुत तेज है,
या तेज है दर्द किसी के छूट जाने का.

कुछ ढूँढती-सी मेरी निगाहें खिड़की से
रह-रह कर टकराते रहे,
आँखों से सूख के ये अश्रु
मेरे मन को भिंगाते रहे.
मन कसकने लगा, याद भी सताने लगी,
न जाने फिर कब मुझे नींद भी आने लगी.

शायद समय की रेल की रफ़्तार बहुत तेज है,
या तेज है दर्द किसी के छूट जाने का.

उम्मीदों का दामन छोड़कर, वक़्त के इस दहलीज़ पे आकर,
जब सिर्फ प्रतिक्रियाविहीन व मूकदर्शक बनकर
देखना पड़ रहा है खिड़कियों से बाहर,
हरे-भरे पेड़ों का जंगली कबीलाओं-सा आंतक
तब सुन्न-से पड़े नीले आकाश को देखकर
इक इच्छा फडफडाती है मन में मेरे कि
काश! होती इक छत, इक वृक्ष की छाया,
बादल का कोई टुकड़ा या सिर्फ धूप की काया.
जिसके नीचे बैठकर
कुछ निज पल एकांत में खुद के लिए भी पा सके,
व बीते कल की जकड़न से खुद को छुड़ा सके.
काश! कहीं मिल पाता ऐसा ही-प्लेटफार्म.

पर शायद समय की रेल की रफ़्तार आज बहुत तेज है,
या तेज है दर्द किसी के छूट जाने का

Wednesday, February 18, 2009

मिट्टी बनाम रिश्तें



आज बारिश हुई है;
बहुत दिनों के बाद
मेरे आँखों में ठंडक-सी पड़ी है.
गीली मिट्टी की सोंधेपन में
रिश्तों-सी बू आ रही है शायद.
पर रिश्तें मिट्टी के तो नहीं होते?
फिर भी कितनी शक्लें
अख्तियार कर लेते हैं न,
ये रिश्तें-मिट्टी के जैसे.
क्यूँ लोग बदल जाते है,
और कैसे रिश्ते मिट्टी में बदल जाते है.
प्यार से मेरे गुंथा हुआ था ये,
समाजरूपी चाक में दरारें फिर भी पड़ ही गई.
समय की आंच में ठीक से पका नहीं था शायद,
इक ठोकर में ही ढेर हो गई.
मिट्टी की थी न,
मिट्टी में ही मिल गई.

Sunday, February 8, 2009

अजन्मा कर्म....



मेरी सोच को कोई लगाम दे दे,
ये बहुत दूर तक चला जाता है.
इसके सिवा भी तो मेरा कोई नहीं,
और अकेला मन बड़ा ही घबराता है.
अभी कल ही तो मेरे भाग्य
से लड़ के आया है.
जीवन के बही-खाते में हुई गड़बडी पर
काफी रोष जताया है.
रूष्ट है विधि के लेख से अब ये,
जो वर्षों पहले ही लिख दिया जाता है.
कहता है, कर्मों से बढकर
कोई और लकीर नहीं होती.
मगर इससे भी तो बड़ी
कोई और जंजीर नहीं होती.
ढूढता फिर वो उस अजन्मे कर्म को,
जिसकी स्याही मेरे खाते में
इतनी उलट-पुलट कर जाता है.....