मुझसे दूर रह के
कैसे तुम खुश रह लेते हो?
मुझको भी सिखा दो जीना,
जैसे मेरे बिन तुम जी लेते हो.
कटती नहीं जब दिन व रातें,
गिनती रहती मैं हर घडियां;
तकती रहती सिर्फ शून्य को,
बेबस-सी मेरी ये अँखियाँ.
मुझको भी तुम सब भुलाना सिखा दो,
कैसे तुम मुझको भुल कर रह लेते हो?
दुःख में भी मुस्कुरा सकूँ, छुपा सकूँ,
जैसे तुम सबसे हँस-बोल लेते हो.
क्यूँ तुम मेरी तरह
बन के रहते नहीं कभी,
क्यूँ तुम्हारी जगह
मुझे कभी मिलती नहीं.
इस दर्द का असर कम हो कैसे,
कैसे तुम सब दर्द को पी लेते हो?
कैसे मैं सिल लूँ, मन के शब्दों को,
जैसे तुम मुझसे यूँ चुप रह लेते हो.
कह दो कि मुझसे कोई रिश्ता
तुम्हारा कभी था ही नहीं;
ये रिश्ता न होता तो
ये सब भी तो होता नहीं.
कैसे तुझे पहचानने से इनकार कर दूँ,
कैसे तुम मुझसे मुँह मोड़ लेते हो?
हो सके तो बना दो अपनी तरह ही,
जैसे तुम पत्थरदिल अब बने फिरते हो.
Thursday, September 3, 2009
Monday, August 31, 2009
सुबह-सवेरे ही.....
सुबह-सवेरे ही
इक सपना देखा था;
रात के अँधेरे में
जैसे कोई अपना रूठा था.
वो जो ऐसे
हाथ में आके फ़िसल गया;
जाना-पहचाना ही था,
फिर-भी जाने कैसे बदल गया?
नमकीन पानी आँखों से होके
जब मन में बहने लगे;
मीठी दरिया थी अन्दर कहीं
सब इस समन्दर में खोने लगे.
अब तो हलक में इतना
कड़वापन-सा लगता है;
झूठ के चाशनी का स्वाद भी
अब फ़ीका-सा लगता है.
हाँ! सुबह-सवेरे ही
इक सपना टूटा है;
रात के अँधेरे में जैसे
कोई अपना छूटा है.....
इक सपना देखा था;
रात के अँधेरे में
जैसे कोई अपना रूठा था.
वो जो ऐसे
हाथ में आके फ़िसल गया;
जाना-पहचाना ही था,
फिर-भी जाने कैसे बदल गया?
नमकीन पानी आँखों से होके
जब मन में बहने लगे;
मीठी दरिया थी अन्दर कहीं
सब इस समन्दर में खोने लगे.
अब तो हलक में इतना
कड़वापन-सा लगता है;
झूठ के चाशनी का स्वाद भी
अब फ़ीका-सा लगता है.
जीवन कड़वी सच्चाईयों की बंद
संदूक जैसे बन गई है;
यह मुस्कराहट भी ताले की
जगह जबरन बैठ गई है.
संदूक जैसे बन गई है;
यह मुस्कराहट भी ताले की
जगह जबरन बैठ गई है.
हाँ! सुबह-सवेरे ही
इक सपना टूटा है;
रात के अँधेरे में जैसे
कोई अपना छूटा है.....
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Sunday, August 23, 2009
तस्वीर तुम्हारी.....
तस्वीर तुम्हारी आज भी
मन में उकेरती हूँ.
आड़ी-तिरछी नज़रों से तेरी
तेरी ही छवि बनाती हूँ.
थोड़ा प्यार का रंग
पहले उसमें उड़ेलती हूँ.
फिर थोड़े-से नाराजगी से
भी तुमको रँगती हूँ.
चंद खिलखिलाहट भी
तुम्हारी भर देती हूँ.
कुछ चुप्पी तुम्हारी
साँसों में घोल लेती हूँ.
फिर लौ तुम्हारी आँखों की
मन के दीये में सुलगा लेती हूँ.
कुछ सपने अनकहे तुम्हारे
लोरी की भांति सुना देती हूँ.
कुछ क्षण तन्हाई तुम्हारी
तन में लपेट लेती हूँ.
कुछ बूँद तेरी यादों की
तकिये में छुपा लेती हूँ.
हाँ! तस्वीर पूरी करने की
भरसक यत्न करती हूँ.
फिर भी तेरी इक झलक को
पल-पल तरसती हूँ.
मन में उकेरती हूँ.
आड़ी-तिरछी नज़रों से तेरी
तेरी ही छवि बनाती हूँ.
थोड़ा प्यार का रंग
पहले उसमें उड़ेलती हूँ.
फिर थोड़े-से नाराजगी से
भी तुमको रँगती हूँ.
चंद खिलखिलाहट भी
तुम्हारी भर देती हूँ.
कुछ चुप्पी तुम्हारी
साँसों में घोल लेती हूँ.
फिर लौ तुम्हारी आँखों की
मन के दीये में सुलगा लेती हूँ.
कुछ सपने अनकहे तुम्हारे
लोरी की भांति सुना देती हूँ.
कुछ क्षण तन्हाई तुम्हारी
तन में लपेट लेती हूँ.
कुछ बूँद तेरी यादों की
तकिये में छुपा लेती हूँ.
हाँ! तस्वीर पूरी करने की
भरसक यत्न करती हूँ.
फिर भी तेरी इक झलक को
पल-पल तरसती हूँ.
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Saturday, August 22, 2009
तेरे नैना.....
तेरे नैना
जब भी देखूँ
सोचूँ मैं ये
कि कैसे कहूँ?
सदा के लिए
इन नैनों में ही
मैं छुप के रहूँ.
तेरे नैना
कुछ न कहे
चुप-से ही रहे,
फिर भी देखे
जब भी मुझे
जैसे कहे
अपना ले मुझे.
तेरे नैना
जैसे कोई
भीतर रिसता गहरे
समंदर का पानी,
मन में बहे
जाने कितने
जनमों की कहानी.
तेरे नैना
बड़े ही शरारती
चंचल होकर
करे जब इशारे,
पलकें मेरी
झुकती ही जाये
हाँ! शर्म के मारे.
तेरे नैना
बहुत सताती
रात-रात भर
मुझको जगाती,
आके सपनों में
कहती मुझसे वो
जो कभी कह न पाती.
तेरे नैना.... हाँ .. तेरे नैना....
जब भी देखूँ
सोचूँ मैं ये
कि कैसे कहूँ?
सदा के लिए
इन नैनों में ही
मैं छुप के रहूँ.
तेरे नैना
कुछ न कहे
चुप-से ही रहे,
फिर भी देखे
जब भी मुझे
जैसे कहे
अपना ले मुझे.
तेरे नैना
जैसे कोई
भीतर रिसता गहरे
समंदर का पानी,
मन में बहे
जाने कितने
जनमों की कहानी.
तेरे नैना
बड़े ही शरारती
चंचल होकर
करे जब इशारे,
पलकें मेरी
झुकती ही जाये
हाँ! शर्म के मारे.
तेरे नैना
बहुत सताती
रात-रात भर
मुझको जगाती,
आके सपनों में
कहती मुझसे वो
जो कभी कह न पाती.
तेरे नैना.... हाँ .. तेरे नैना....
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Thursday, August 20, 2009
बादल भी रोने लगे...........
अचानक तंद्रा टूटी तो देखा
दरवाजे से बाहर,
काले बादल दौड़ते हुए चले आ रहे थे
मेरी तरफ.
कोई अप्रत्याशित घटना
अभी-अभी घटित हुई हो जैसे,
व जिसकी सूचना मुझे देने
बदहवास-से आ रहे हो ऐसे.
मैं भी शंकित-सी, भयभीत-सी
दौड़ के चली गई बरामदे तक,
पूछने को कि क्या हो गया?
कौन-सा आसमान गिर गया?
प्रश्न करूँ इससे पहले ही
ढेर सारी बड़ी-बड़ी तितलियाँ,
जिन्हें हम बचपन में
"हेलीकाप्टर" की संज्ञा दिया करते थे,
बादलों की विपरीत दिशा में
भागे जा रही थी; जैसे
काले भूत को देख लिया हो.
शायद बादल की बदहवासी का
गहरा असर हुआ था उन पर.
मैं चिल्लाई कि क्या हुआ?
मगर दूरी इतनी भी कम न थी
कि वो मुझे समझ पाई
और न ही मैं उत्तर जान पाई.
बस प्रतीक्षा करने लगी कि
वो पास आके दम तो ले ले ज़रा.
इतने में पंद्रह चीलें,
मैंने ठीक से ही गिना था,
आसमान में अचानक से आ गए.
जैसे कि आज ही उनका व्यायाम-सत्र
आरंभ हुआ हो.
कभी इक ही धुरी पर
चकरी बन घूमने लग जाते
तो कभी कतार बना के
जाने किन्हें लुभाते.
ऐसा भी लगा कि
सुनामी आने से पहले की
चेतावनी दे रहे हो.
अब बस कुछ ही पल की दूरी बाकी थी,
मुझमे और बादलों में.
मैं भी भूमिका बाँधने लगी
मन-ही-मन कि पूछूँ कैसे?
होंठ लरजते इससे पहले
बेईमान हवा ऐसी आई
अपने संग बादलों को भी ले गई उड़ा.
अनुत्तरित होकर मन के सारे प्रश्न
जब रोआंसें-से होने लगे.
तब दूर जा के देखा तो
बादल भी रोने लगे.
दरवाजे से बाहर,
काले बादल दौड़ते हुए चले आ रहे थे
मेरी तरफ.
कोई अप्रत्याशित घटना
अभी-अभी घटित हुई हो जैसे,
व जिसकी सूचना मुझे देने
बदहवास-से आ रहे हो ऐसे.
मैं भी शंकित-सी, भयभीत-सी
दौड़ के चली गई बरामदे तक,
पूछने को कि क्या हो गया?
कौन-सा आसमान गिर गया?
प्रश्न करूँ इससे पहले ही
ढेर सारी बड़ी-बड़ी तितलियाँ,
जिन्हें हम बचपन में
"हेलीकाप्टर" की संज्ञा दिया करते थे,
बादलों की विपरीत दिशा में
भागे जा रही थी; जैसे
काले भूत को देख लिया हो.
शायद बादल की बदहवासी का
गहरा असर हुआ था उन पर.
मैं चिल्लाई कि क्या हुआ?
मगर दूरी इतनी भी कम न थी
कि वो मुझे समझ पाई
और न ही मैं उत्तर जान पाई.
बस प्रतीक्षा करने लगी कि
वो पास आके दम तो ले ले ज़रा.
इतने में पंद्रह चीलें,
मैंने ठीक से ही गिना था,
आसमान में अचानक से आ गए.
जैसे कि आज ही उनका व्यायाम-सत्र
आरंभ हुआ हो.
कभी इक ही धुरी पर
चकरी बन घूमने लग जाते
तो कभी कतार बना के
जाने किन्हें लुभाते.
ऐसा भी लगा कि
सुनामी आने से पहले की
चेतावनी दे रहे हो.
अब बस कुछ ही पल की दूरी बाकी थी,
मुझमे और बादलों में.
मैं भी भूमिका बाँधने लगी
मन-ही-मन कि पूछूँ कैसे?
होंठ लरजते इससे पहले
बेईमान हवा ऐसी आई
अपने संग बादलों को भी ले गई उड़ा.
अनुत्तरित होकर मन के सारे प्रश्न
जब रोआंसें-से होने लगे.
तब दूर जा के देखा तो
बादल भी रोने लगे.
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विश्वासघाती
सवेरे-से कटोरी-भर चावल
रखे थे मैंने,
कोई तो उन्हें चुगने आएगा;
डिब्बे में बंद सड़ रहे थे दाने,
किसी का तो भला हो जायेगा.
पर नहीं..
अब तो मैना मुझसे भी ज्यादा
सयानी हो गई है;
उनकी आंखों में अब अपनों के लिए भी
खौफ़ पैदा हो गई है.
चलो कोई नहीं..
सबकी अपनी इच्छा;
अब तो दुनिया भी ऐसी ही हो चली है,
शायद इसकी कहानी भी यही हो गई है.
सांझ ढलते दो मैना
दिख ही गए, घास में कुछ चुन रही थी वो,
मैंने भी विश्वास का जाल फेंकना चाहा,
सो सारी कटोरी ही उडेल डाली;
डर मत! मैं भी धीरे से
विश्वास का पैबंद लगाने का प्रयत्न कर रही थी.
परन्तु..
उनका विश्वास मुझसे भी अधिक था,
उड़ के चली गई पासवाले बरामदे पर;
और छुप के ढूँढने लगी मुझ नासमझ को
कि इस बार कौन नया विश्वासघाती था.
रखे थे मैंने,
कोई तो उन्हें चुगने आएगा;
डिब्बे में बंद सड़ रहे थे दाने,
किसी का तो भला हो जायेगा.
पर नहीं..
अब तो मैना मुझसे भी ज्यादा
सयानी हो गई है;
उनकी आंखों में अब अपनों के लिए भी
खौफ़ पैदा हो गई है.
चलो कोई नहीं..
सबकी अपनी इच्छा;
अब तो दुनिया भी ऐसी ही हो चली है,
शायद इसकी कहानी भी यही हो गई है.
सांझ ढलते दो मैना
दिख ही गए, घास में कुछ चुन रही थी वो,
मैंने भी विश्वास का जाल फेंकना चाहा,
सो सारी कटोरी ही उडेल डाली;
डर मत! मैं भी धीरे से
विश्वास का पैबंद लगाने का प्रयत्न कर रही थी.
परन्तु..
उनका विश्वास मुझसे भी अधिक था,
उड़ के चली गई पासवाले बरामदे पर;
और छुप के ढूँढने लगी मुझ नासमझ को
कि इस बार कौन नया विश्वासघाती था.
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Wednesday, August 19, 2009
चले आओ.........
कुछ दिनों से हवाओं में कुछ नशा सा है,
कारण पूछा तो बादलों में तस्वीर तुम्हारी ही दिखने लगी.
ऐसा क्यूँ होता है, खुद पे हंसी मैं,
दर्पण में तुम और भी गहरे होते गए, मैं कहीं पिघलने लगी.
क्यूँ आये तुम इतनी देर से, कहाँ थे अभी तक तुम?
जाने क्या-क्या शिकायत मुझे अब तुमसे होने लगी.
चले आओ मेरी आवाज़ सुन के या आ जाऊँ मैं सब छोड़ के,
पल-पल में तुम्हारे छिन जाने के ख्याल से अब मैं डरने लगी.
तुम मेरे ही हो, ऐसा सोचने का क्यूँ मन करता है,
क्यूँ तुम्हारे ख्यालों में अब मैं सिर्फ तुम्हारी ही बनने लगी.
हाँ तुम ही हो मेरे सपनों के राजकुमार! जिसकी खुशबु
अब मेरे मानस-पटल से उतर कर मेरे इर्द-गिर्द बिखरने लगी.
कारण पूछा तो बादलों में तस्वीर तुम्हारी ही दिखने लगी.
ऐसा क्यूँ होता है, खुद पे हंसी मैं,
दर्पण में तुम और भी गहरे होते गए, मैं कहीं पिघलने लगी.
क्यूँ आये तुम इतनी देर से, कहाँ थे अभी तक तुम?
जाने क्या-क्या शिकायत मुझे अब तुमसे होने लगी.
चले आओ मेरी आवाज़ सुन के या आ जाऊँ मैं सब छोड़ के,
पल-पल में तुम्हारे छिन जाने के ख्याल से अब मैं डरने लगी.
तुम मेरे ही हो, ऐसा सोचने का क्यूँ मन करता है,
क्यूँ तुम्हारे ख्यालों में अब मैं सिर्फ तुम्हारी ही बनने लगी.
हाँ तुम ही हो मेरे सपनों के राजकुमार! जिसकी खुशबु
अब मेरे मानस-पटल से उतर कर मेरे इर्द-गिर्द बिखरने लगी.
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Friday, July 24, 2009
Amrit
A tesimonial to my friend Amrit [note: * his fav song]
इक लड़का "आते-जाते"* जाने
क्या-क्या गुनगुनाते रहता है;
शायद "तुम बिन"* की कहानियाँ
खुद में ही दोहराते जाता है.
न ज़मीन, न ही खुले आकाश पर
उसका डेरा जमता रहता है;
वो तो चलता है तो बस
पानियों में जैसे बहता रहता है.
खेलने की आदत गई नहीं उसकी,
मछलियों का दिल अब भी पकड़ता रहता है;
flirt में माहिर, फिर भी वो शातिर
gentleman बना फिरता रहता है.
बारिश में भींग कर जब फ़ोन करता है,
"oh shit!"-- जैसे उसका ringtone बजता है;
sms का full package लेके घूमते रहता है,
कब कौन नया नंबर मिल जाये, पूछूँ तो
"keep shut" उसका जैसे hellotune बन जाता है.
experience तो 29 yrs. का ही बताता है,
फिर भी बुढ्ढे होने से अब भी कतराता है;
दिखने में तो dracula सा लगता है,
बोलूं तो black belt की धौंस जमाता है.
कुछ शौक अच्छे है उसके, कभी कभार
photography भी कर लेता है.
तस्वीरें मगर वही अच्छी उसकी,
जिसमें वो कहीं नहीं होता है.
गाने को बोलूं तो पहली बार
उसको खुद पे शरम आता है;
सुन लेना जरूर उसकी आवाज़ को,
वो हर दम ही दिल से गाता है.
बातें करेगा मन भर की वो तुमसे,
तुम करो तो -"ज्यादा हो रहा है" ऐसा कहता है;
सबकी हर बातें याद रखता है वो, खुद
को ही कहीं भुल कर आ जाता है.
वो हँसता-बोलता है , ऐसा कर के
कुछ का तो दिल जरूर चुराता है;
जो न मिले तो, "GTH"
type कर ek msg. छोड़ जाता है.
खट्टी-मिठ्ठी अहसासों से भरा हुआ है वो
फिर क्यूँ वो "amrit" कहलाता है....
इक लड़का "आते-जाते"* जाने
क्या-क्या गुनगुनाते रहता है;
शायद "तुम बिन"* की कहानियाँ
खुद में ही दोहराते जाता है.
न ज़मीन, न ही खुले आकाश पर
उसका डेरा जमता रहता है;
वो तो चलता है तो बस
पानियों में जैसे बहता रहता है.
खेलने की आदत गई नहीं उसकी,
मछलियों का दिल अब भी पकड़ता रहता है;
flirt में माहिर, फिर भी वो शातिर
gentleman बना फिरता रहता है.
बारिश में भींग कर जब फ़ोन करता है,
"oh shit!"-- जैसे उसका ringtone बजता है;
sms का full package लेके घूमते रहता है,
कब कौन नया नंबर मिल जाये, पूछूँ तो
"keep shut" उसका जैसे hellotune बन जाता है.
experience तो 29 yrs. का ही बताता है,
फिर भी बुढ्ढे होने से अब भी कतराता है;
दिखने में तो dracula सा लगता है,
बोलूं तो black belt की धौंस जमाता है.
कुछ शौक अच्छे है उसके, कभी कभार
photography भी कर लेता है.
तस्वीरें मगर वही अच्छी उसकी,
जिसमें वो कहीं नहीं होता है.
गाने को बोलूं तो पहली बार
उसको खुद पे शरम आता है;
सुन लेना जरूर उसकी आवाज़ को,
वो हर दम ही दिल से गाता है.
बातें करेगा मन भर की वो तुमसे,
तुम करो तो -"ज्यादा हो रहा है" ऐसा कहता है;
सबकी हर बातें याद रखता है वो, खुद
को ही कहीं भुल कर आ जाता है.
वो हँसता-बोलता है , ऐसा कर के
कुछ का तो दिल जरूर चुराता है;
जो न मिले तो, "GTH"
type कर ek msg. छोड़ जाता है.
खट्टी-मिठ्ठी अहसासों से भरा हुआ है वो
फिर क्यूँ वो "amrit" कहलाता है....
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Thursday, July 9, 2009
क्षणिक मुस्कुराहट..........
मालूम नहीं कैसे उनके चेहरे पर
वो प्यारी-सी लकीर यूँ ही बरबस
बिना बात के आ जाती है.
शायद कुछ याद बन के आ जाते है,
कुछ अकारण,
और कुछ तो मुखौटे की तरह
किसी कारण-विशेष ही आते है.
मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ कई बार,
अकसर मगर यादों की लकीरें
न चाहते हुए भी
एक खरोंच भेंट-स्वरुप दे जाती है;
मुखौटे के भीतर भी दम घुटने को होता है,
जीने की चाहत जैसे कम होने लगती है
- साँसों के उखड़ने के तरह;
और बिना कारण
तो कुछ भी नहीं मिलता,
फिर यह क्षणिक मुस्कुराहट भी कैसे?
सोचती हूँ क्या है वो जो,
फिर भी हँसने को मजबूर करती है;
शायद मेरी तरह और भी है,
इक-दूसरे को इक ही मुखौटा पहने देखना
व इक जैसा ही दागनुमा चेहरा,
अनगिनत यादों की निशानी -
शायद यही संजोग मुझको
मुस्कुराने पर विवश कर देती है.
वो प्यारी-सी लकीर यूँ ही बरबस
बिना बात के आ जाती है.
शायद कुछ याद बन के आ जाते है,
कुछ अकारण,
और कुछ तो मुखौटे की तरह
किसी कारण-विशेष ही आते है.
मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ कई बार,
अकसर मगर यादों की लकीरें
न चाहते हुए भी
एक खरोंच भेंट-स्वरुप दे जाती है;
मुखौटे के भीतर भी दम घुटने को होता है,
जीने की चाहत जैसे कम होने लगती है
- साँसों के उखड़ने के तरह;
और बिना कारण
तो कुछ भी नहीं मिलता,
फिर यह क्षणिक मुस्कुराहट भी कैसे?
सोचती हूँ क्या है वो जो,
फिर भी हँसने को मजबूर करती है;
शायद मेरी तरह और भी है,
इक-दूसरे को इक ही मुखौटा पहने देखना
व इक जैसा ही दागनुमा चेहरा,
अनगिनत यादों की निशानी -
शायद यही संजोग मुझको
मुस्कुराने पर विवश कर देती है.
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Sunday, May 17, 2009
ज़िन्दगी जैसे मेरी परियों की कहानी....
हाँ मैं थक गई हूँ
तितलियों के पीछे भागते हुए,
हाँ मैं ऊब गई हूँ अब.
पुतलों के संग जीवन व्यतीत करते हुए
कब किसको अच्छा लगा है?
संग अपने उनकी भी बातें स्वयं लिखना
व कहना, बड़ी दुर्दशा है.
कोई तो हो जो कहें अपने मन की बातें
तो मैं जीवन भर सुनती रहूँ...
कब तक खुद की कहानियाँ
मैं यूँ ही बुनती रहूँ?
ढूंढती उस राजा को, जो
बदल दे मेरी जिंदगानी;
ढेर सारी खुशियों के बदले
ले ले मेरी सारी वीरानी.
ज़िन्दगी जैसे मेरी परियों की कहानी
और मैं
इन सब कहानियों की अकेली रानी......
तितलियों के पीछे भागते हुए,
हाँ मैं ऊब गई हूँ अब.
पुतलों के संग जीवन व्यतीत करते हुए
कब किसको अच्छा लगा है?
संग अपने उनकी भी बातें स्वयं लिखना
व कहना, बड़ी दुर्दशा है.
कोई तो हो जो कहें अपने मन की बातें
तो मैं जीवन भर सुनती रहूँ...
कब तक खुद की कहानियाँ
मैं यूँ ही बुनती रहूँ?
ढूंढती उस राजा को, जो
बदल दे मेरी जिंदगानी;
ढेर सारी खुशियों के बदले
ले ले मेरी सारी वीरानी.
ज़िन्दगी जैसे मेरी परियों की कहानी
और मैं
इन सब कहानियों की अकेली रानी......
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जीवन इक नाटक जो होता....
जीवन इक नाटक जो होता तो अच्छा रहता....
सारे किरदार पहले से मुझे मालूम रह्ते
और जान भी जाती मैं
उनकी हिस्सेदारी अपने जीवन में.
तब न भय रहता किसी के छूट जाने का
और न ही
कोई रोमांच किसी नए के जुड़ जाने का.
शायद जीवन तब ज्यादा तरतीब से सजी रहती,
मेरे मन के अंदरूनी दीवारों में
ये टूटन, चुभन, खरोंच, दरारें नहीं पड़ी होती.
कब कौन क्या कैसे बोल जायेगा व
कौन बिना कहे क्या सदमा दे जायेगा,
ऐसे हादसों का क्रम तब कुछ कम हो पाता.
कहानी के संवाद तो पहले ही याद कर लेती,
हर पग जीवन का फिर पहचाना-सा लगता,
भले ही दो कदम भी चलना दूभर लगता.
सहमती न मैं फिर कभी किसी रिश्ते की बुनियाद पर,
न ही ठहरती किसी की आस लिए अंतहीन विराम पर.
....क्यूँकि मुझे इस नाटक का अंत तो पता रहता.
सारे किरदार पहले से मुझे मालूम रह्ते
और जान भी जाती मैं
उनकी हिस्सेदारी अपने जीवन में.
तब न भय रहता किसी के छूट जाने का
और न ही
कोई रोमांच किसी नए के जुड़ जाने का.
शायद जीवन तब ज्यादा तरतीब से सजी रहती,
मेरे मन के अंदरूनी दीवारों में
ये टूटन, चुभन, खरोंच, दरारें नहीं पड़ी होती.
कब कौन क्या कैसे बोल जायेगा व
कौन बिना कहे क्या सदमा दे जायेगा,
ऐसे हादसों का क्रम तब कुछ कम हो पाता.
कहानी के संवाद तो पहले ही याद कर लेती,
हर पग जीवन का फिर पहचाना-सा लगता,
भले ही दो कदम भी चलना दूभर लगता.
सहमती न मैं फिर कभी किसी रिश्ते की बुनियाद पर,
न ही ठहरती किसी की आस लिए अंतहीन विराम पर.
....क्यूँकि मुझे इस नाटक का अंत तो पता रहता.
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Thursday, April 9, 2009
इक इंतजार तुम्हारा.....
समय के इस मोड़ पर
जाने कबसे मैं बैठी
सोच रही हूँ।
किस ओर आगे बढूँ,
सभी दिशायें तो मैं
तक रही हूँ।
हवाएं भी भटका देती है,
कभी-कभी, जिधर देखो वहीँ-से
लगता बह रही हो।
सूरज के किस किरण को
पकड़ के आगे बढूँ, आंखों में
जब सब चुभ रही हो।
पशोपेश में तो हूँ, राह फ़िर भी
चुन लुंगी मैं, मन इतना तो
दृढ़ हो रहा है।
रुकी हूँ तो बस तुम्हारे लिए,
इक इंतजार तुम्हारा दिल अब भी
कर रहा है।
जाने कबसे मैं बैठी
सोच रही हूँ।
किस ओर आगे बढूँ,
सभी दिशायें तो मैं
तक रही हूँ।
हवाएं भी भटका देती है,
कभी-कभी, जिधर देखो वहीँ-से
लगता बह रही हो।
सूरज के किस किरण को
पकड़ के आगे बढूँ, आंखों में
जब सब चुभ रही हो।
पशोपेश में तो हूँ, राह फ़िर भी
चुन लुंगी मैं, मन इतना तो
दृढ़ हो रहा है।
रुकी हूँ तो बस तुम्हारे लिए,
इक इंतजार तुम्हारा दिल अब भी
कर रहा है।
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Saturday, April 4, 2009
चलना न उस राह पर......
निकलोगे जो मंजिल की तलाश पर
मिलेंगे सौ कंकड़ तुझको राह पर।
पूछ लेना मेरा नाम उनसे, जो
पहचान ले तो चलना न उस राह पर।
क्यूँकि कभी हम भी चले थे उस डगर पर,
और जा पहुँचे किसी मायूसी के घर पर।
मिलेंगे सौ कंकड़ तुझको राह पर।
पूछ लेना मेरा नाम उनसे, जो
पहचान ले तो चलना न उस राह पर।
क्यूँकि कभी हम भी चले थे उस डगर पर,
और जा पहुँचे किसी मायूसी के घर पर।
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मैं 'कस्तूरी मृग'....
तुम मौसम भी होते,
तो इंतज़ार रहता
बार-बार तेरे वापस आने का.
तुम परछाई भी होते,
तो अहसास रहता
हर पल तेरे पास होने का.
तुम तनहाई भी होते
तो मन करता
तेरी बाँहों में लिपट के सो जाने का.
तुम ख्वाब भी होते,
तो जी करता
तुझको आँखों में बसा लेने का.
तुम महावर भर भी होते,
तो रंग तुम्हारा ही रहता
तन-मन के हर कोनों का.
तुम स्याही भी होते,
तो लिखती हर जीवन-अध्याय
नाम होता तेरा मेरे हर पन्नों का.
तुम खुशबु भी होते,
तो छुपा लेती नाभि में
मैं 'कस्तूरी मृग' चाहूँ तुझमें ही में खोने का.
तो इंतज़ार रहता
बार-बार तेरे वापस आने का.
तुम परछाई भी होते,
तो अहसास रहता
हर पल तेरे पास होने का.
तुम तनहाई भी होते
तो मन करता
तेरी बाँहों में लिपट के सो जाने का.
तुम ख्वाब भी होते,
तो जी करता
तुझको आँखों में बसा लेने का.
तुम महावर भर भी होते,
तो रंग तुम्हारा ही रहता
तन-मन के हर कोनों का.
तुम स्याही भी होते,
तो लिखती हर जीवन-अध्याय
नाम होता तेरा मेरे हर पन्नों का.
तुम खुशबु भी होते,
तो छुपा लेती नाभि में
मैं 'कस्तूरी मृग' चाहूँ तुझमें ही में खोने का.
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Monday, March 30, 2009
समय फ़िर पीछे लौट आया है....
खवाबों के झूठे प्यालों में, मैंने
पिया है तेरी यादों का जाम
फ़िर-से.
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
देखूं मैं तुझको संग अपने,
चलने लगी तेरे हाथों को थाम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
प्यार-भरी बातें भी होने लगी,
तेरी बाहों में पिघलने लगी मैं, जैसे कोई मोम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है ,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
मिलने की खुशियाँ फ़िर बढ़ने लगी,
और जवां भी होने लगी हर पिछली कसम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
साथ ये जो सदा रहता ऐसी किस्मत
अपनी कहाँ, जुदा हो ही गए हम
फ़िर-से।
देखो सपने में भी तुझको अलग पाया है,
समय भी क्या कभी पीछे लौट पाया है.
पिया है तेरी यादों का जाम
फ़िर-से.
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
देखूं मैं तुझको संग अपने,
चलने लगी तेरे हाथों को थाम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
प्यार-भरी बातें भी होने लगी,
तेरी बाहों में पिघलने लगी मैं, जैसे कोई मोम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है ,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
मिलने की खुशियाँ फ़िर बढ़ने लगी,
और जवां भी होने लगी हर पिछली कसम
फ़िर-से।
देखो क्या नशा छाया है,
समय फ़िर पीछे लौट आया है।
साथ ये जो सदा रहता ऐसी किस्मत
अपनी कहाँ, जुदा हो ही गए हम
फ़िर-से।
देखो सपने में भी तुझको अलग पाया है,
समय भी क्या कभी पीछे लौट पाया है.
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Thursday, March 5, 2009
मेरी प्यारी पड़ोसन...
*someone asked me to describe the sweetness about one of my fnd when I introduced her as "my sweet padosan"... n I said----
"भंवरों को होती रहती मुश्किल, मंडरते रहते आस-पास ऐसी मधुर वाणी...
वो चंचल-चित्त व आँखों में लिए हुए है मीठी शरारतों की कई निशानी...
चले जिस पग से, छोड़ जाए इक मीठी-सी गुदगुदाती कोई नर्म-सी कहानी...
चंदा भी मीठी-मीठी बातें करे देख उसके मन का सुन्दर रूप, चांदनी को भी होती परेशानी..."
"भंवरों को होती रहती मुश्किल, मंडरते रहते आस-पास ऐसी मधुर वाणी...
वो चंचल-चित्त व आँखों में लिए हुए है मीठी शरारतों की कई निशानी...
चले जिस पग से, छोड़ जाए इक मीठी-सी गुदगुदाती कोई नर्म-सी कहानी...
चंदा भी मीठी-मीठी बातें करे देख उसके मन का सुन्दर रूप, चांदनी को भी होती परेशानी..."
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Wednesday, March 4, 2009
चलो अच्छा हुआ तुम चले गए तो...

दर्द छिपाने की कोशिश में मैं क्या न करती गई।
कभी धूल के बहाने सच को पोंछती गई,
कभी होठों में झूठ के सौ रंग भरती गई।
कोई शिकायत नहीं, सबको बस यही कहती गई,
दूसरों में जब गिनाने लगे, तो तुम्हारा
परिचय भी मैं परायों में करती गई।
यही दस्तूर है जब सबकी खुशियों का,
तो मैं कंटीली राह ही सही, पर चलती गई।
नहीं मानती अब भी मैं ऊपरवाले को,
अपनी किस्मत को मैं ख़ुद ही लिखती गई।
कल तुम्हारा साथ लिखा था , आज उन्हीं
हथेलियों में बिछोह की लकीर खींचती गई।
क्या समझोगे तुम इस पीड़ा को, तुमको
जानने में जब सदियाँ भी मुझे कम लगती गई।
चलो अच्छा हुआ तुम चले गए तो,
कुछ दुनिया देख ली, कुछ समझदारी भी आती गई।
कभी धूल के बहाने सच को पोंछती गई,
कभी होठों में झूठ के सौ रंग भरती गई।
कोई शिकायत नहीं, सबको बस यही कहती गई,
दूसरों में जब गिनाने लगे, तो तुम्हारा
परिचय भी मैं परायों में करती गई।
यही दस्तूर है जब सबकी खुशियों का,
तो मैं कंटीली राह ही सही, पर चलती गई।
नहीं मानती अब भी मैं ऊपरवाले को,
अपनी किस्मत को मैं ख़ुद ही लिखती गई।
कल तुम्हारा साथ लिखा था , आज उन्हीं
हथेलियों में बिछोह की लकीर खींचती गई।
क्या समझोगे तुम इस पीड़ा को, तुमको
जानने में जब सदियाँ भी मुझे कम लगती गई।
चलो अच्छा हुआ तुम चले गए तो,
कुछ दुनिया देख ली, कुछ समझदारी भी आती गई।
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Tuesday, March 3, 2009
तुझको क्या अब कहूँ मैं.....

ये कैसा ज़लज़ला है,इस दिल में
हर पल जो उफ़नता रहता है.
कभी आँखों से बहता है,
कभी दिल से रिसता रहता है.
तुझको क्या अब कहूँ मैं,
दिल तो बस रोता रहता है.
कैसे यकीन कर डाला तुझपे,
ये कह के हँसता रहता है.
तेरी कीमत क्यूँ आंकी इस
दिल से मेरे,यही अफ़सोस अब रहता है.
अहसासों की कदर न रही जहाँ,
सरेआम बस तमाशा अब बनता है.
दर्द के इस तूफ़ान में फंस न जाए
कहीं तू भी मेरी तरह,
अपनी किस्मत से अब यूँ डर-सा लगता है.
इसलिए तेरे आँसू भी रख लिए
अपनी चादर के तले,
कि इस दर्द का असर तुझ-पर भी फ़ैल सकता है.
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