Tuesday, January 6, 2009

सौदागर.. न सौदा कर



सपनों के सौदागर
न सौदा कर,
इन लमहों का,
क्या मोल इसका तुम दे पाओगे,
क्या मेरी तरह इन्हें फिर से जी पाओगे?
क्या कीमत है तुम्हारे लिए
जिनमें हर सांस मेरी अटकी हुई है...
क्या जरूरत है तुम्हारे लिए
जिनमें हर बात बनती-बिगड़ती रही है,
ऐसे जीवन का तुम क्या मोल दोगे,
जो सिर्फ सिसकने के लिए बनी हुई है...
अब कौन-से सपनो को दाँव में लगाओगे,
जहाँ पहले से ही हर सपने दाँव में लगे हुए है...

2 comments:

निर्झर'नीर said...

आके ब्लॉग पर इत्तिफाक से ही आना हुआ बहुत सी कवितायेँ पढ़ी ..हर एक कविता की तारीफ़ में कुछ न कुछ लिखा हुआ पाया लेकिन ये खूबसूरत सा ख्याल या यूँ कहो ख्वाब बिना दाद के मायूस लग रहा था इसलिए अपने भाव यहाँ लिख रहा हूँ ..सुन्दर समर्पित और भावुक करने वाले अहसासों को आपने शब्दों में पिरोया है ....बंधाई स्वीकारें

वन्दना महतो ! said...

@ निर्झर'नीर जी आपका बहुत स्वागत है ब्लॉग में. आपके ख़ूबसूरत कमेंट्स के लिए भी बहुत शुक्रगुज़ार है हम!