Sunday, February 8, 2009

क्या अंतर फ़िर रह गया..?



जाने कहाँ खो गया....
मेरा रस्ता
अभी तो यहीं था;
बस इस मोड़ से ही गुम हो गया.....
कैसे बढूँ अब मैं,
इस अंजान डगर में;
जी डरता है,
कभी-कभी कहता है;
कहीं कुछ रह तो नहीं है गया.....
चलो मन मान भी ले,
ये सच जान भी ले;
कि जीवन रुकता नहीं,
समय यूँ ठहरता नहीं;
फिर क्यूँ लगे जैसे सबकुछ थम-सा है गया.....
कुछ अच्छा-ही मिल जाये,
तो चलना सफल हो जाये;
जो दिन फिर यही लौट आये,
मन सोच के बस यही घबराए;
कि इस जीवन से उस जीवन में
क्या अंतर फिर रह गया???

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