जीवन की तपिश में जलते हुए
तुम्हारी झलक के दो बूँद की प्यासी,
तरसती मेरी आँखें जा टिकी है,
मेरे होस्टल के सामने उसी पेड़ के नीचे,
जहाँ कभी तुमने मेरा इंतज़ार किया था.
यही सपना देखा था न,तुमने और मैंने भी.
पता है, मानसून अब आनेवाला है,
आज तो बूँदा-बांदी भी हुई है.
और अभी से मेरा मन
होस्टल के गेट पे पहरेदारी करने लगा है;
तुम्हारा रास्ता देखने के लिए तो
मेरे साथ-साथ उस पेड़ के पत्तों में
छोटी-छोटी बूँदें भी, जो तुम पर ही
बरसने के लिए जम रही है,व्याकुल होने लगे है.
देखो आधा सपना तो सच होने लगा है न,
अब तुम भी आ जाओ!
इस सपने को पूरा करने के लिए.