तम्बाकू की तरह रखा करती हूँ;
तुम्हें याद करने की कोशिश में
कई बार तुम्हे सुलगाया भी करती हूँ.
सोचती हूँ, शायद इसी तरह
कभी तो तुम मुझे पढ़ लोगे;
हर कश में तुम्हें अब मैं
धुआँ बना कर निगला करती हूँ.
तुम अब भी वैसे ही हो,
तुम अब भी नहीं बदले;
तुम अब भी मुझे पढ़ कर
वापस लौट जाया करते हो.
इस बात को समझे कोई कैसे,
कैसे मान लूँ तुम मेरे लिए नहीं हो?
तुम जल के भी मेरे हाथों में
अपने नाम की रेखा खींच मुस्कुराते हो.
तुम जैसे भी हो मेरे जीवन में,
अस्तित्वहीन होकर भी एक कहानी रचते हो;
कोई नहीं तेरा मैं - कहते हो,
और फ़िर अनजानों-सा रिश्ता भी बनाते हो.
मगर रिश्तों में पूर्ण-विराम शायद
लिखना भूल गया वो लिखनेवाला;
कभी खुद को तो कभी तुमको जला के
जाने कौन-सी अंतिम स्याही बनाया करती हूँ?
अब मैं तुम्हे कागज़ में लिपटे
तम्बाकू की तरह रखा करती हूँ;
तुम्हें याद करने की कोशिश में
कई बार तुम्हे सुलगाया भी करती हूँ.

